March 4, 2026

सीबीएसई में नम्बरों की बरसात

 

सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन (सीबीएसई) की परीक्षाओं में साल दर साल नंबरों की मूसलाधार बारिश हमारी शिक्षा पद्धति को हंसी का पात्र बना रही है। इससे सीधा संकेत यह मिल रहा है शिक्षा में देर से सही, पर परीक्षा प्रणाली में तुरंत किसी बड़े बदलाव की जरूरत है। इस साल सीबीएसई की 12वीं की परीक्षा में 500 में 499 नंबर लाने वाले दो टॉपरों और 2 लाख 40 हजार से यादा 90 पर्सेंट से यादा मार्क्स लाने वालों के बाद 10वीं के बोर्ड में 13 बचों ने संयुक्त रूप से टॉप किया है। इन सभी को 500 में से 499 अंक मिले हैं। 498 अंक लाकर 24 बचे दूसरे स्थान पर हैं। बारहवीं की एक टॉपर, आर्ट्स स्ट्रीम की हंसिका ने इ ंग्लिश में 99 मार्क्स को अपने साथ नाइंसाफी बताते हुए अदालत जाने की बात कही है। हिस्ट्री, पॉलिटिकल साइंस, साइकॉलजी और हिंदुस्तानी वोकल (संगीत) में उसने 100 में से 100 हासिल किए हैं। क्या ये विषय ऐसे हैं जिनमें हर सवाल के सौ टंच सही जवाब दिए जा सकें?

लगभग हर विषय में पूर्णांक पाने वाले स्टूडेंट्स की संया का लगातार बढऩा यही बताता है कि हमारी परीक्षा पद्धति मीडियॉक्रिटी के एक ढर्रे में फंसकर रह गई है। तमाम स्कूल और कोचिंग संस्थान बचों को सिर्फ वह ढर्रा पकड़ाने के लिए, बचों को वह कुंजी थमाने के लिए बैठे हैं, जिससे अंकों का खजाना खुलता है। दूसरे शब्दों में कहें तो वे बचों को रट्टू तोता बना रहे हैं। यादा से यादा अंक बचों और उनके मां-बाप को तात्कालिक खुशी देते हैं और किसी अछे कॉलेज में एडमिशन का रास्ता खोलते हैं। उनके भीतर रचनात्मकता को बढ़ावा देना इनके अजेंडे में ही नहीं है। बचों में उत्सुकता, जिज्ञासा, खोजबीन की तड़प या किसी कौशल में असाधारण निपुणता पैदा करना तो अब शिक्षण जगत की कल्पना से भी परे हो गया है। कुल मिलाकर इससे देश में धंधेबाजों और पिछलग्गुओं की जमात पैदा हो रही है। शोध और अन्वेषण में भारत के फिसड्डी रह जाने की मुय वजह यही है।

वरिष्ठ भारतीय उद्यमी और बहुराष्ट्रीय कंपनियां शिकायत करती हैं कि भारत में इंजीनियरों के पास सिर्फ डिग्री होती है, योग्यता नहीं। हमारे शिक्षा ढांचे के पालनहारों को जवाब में कुछ कहना जरूरी नहीं लगता। भारत को नॉलेज पॉवर और मैन्युफैक्चरिंग हब बनाना क्या इस पूर्णांक बांटने वाली शिक्षा पद्धति के बूते की बात है? परीक्षा के आधार पर छात्रों का मूल्यांकन और देशों में भी किया जाता है लेकिन उनका जोर विद्यार्थियों की प्रतिभा को उभारने पर होता है। चीन में माओ त्से तुंग ने काफी पहले कहा था कि अगर पांच प्रश्नों में से पांचों के जवाब कोई औसत ढंग से दे तो उसे 60 प्रतिशत से यादा अंक न मिलें, लेकिन कोई छात्र यदि एक ही प्रश्न का असाधारण और मौलिक उत्तर दे तो भी उसे 60 प्रतिशत अंक दे दिए जाने चाहिए। सवाल वही कि हमारे केंद्रीय शिक्षा बोर्ड क्या बचों के मूल्यांकन को लेकर लीक से हटने को तैयार होंगे?