भयावह जल संकट की महसूस होती आहट
( आखरीआंख )
‘सबको मुबारकबादज्हम लोगों ने इस साल 50 डिग्री तापमान प्राप्त कर लिया है, आइए मिलकर और यादा पेड़ काटें ताकि अगले साल 60 डिग्री वाला ध्येय पा सकेंज्।Ó पिछले दिनों ट्विटर पर चला तंज कसता यह संदेश झटके की तरह है। कहा नहीं जा सकता कि क्या अधिकांश लोगों ने इसे भूलने के वास्ते पढ़ा था या चंद ऐसे भी हैं, जिन्होंने इसमें निहित संदेश पर विचार करने के बाद मनन किया होगा।
बहरहाल असर कुछ भी रहा हो लेकिन तथ्य यह है कि पिछले 140 वर्षों में, जब से तापमान का बाकायदा रिकॉर्ड रखना शुरू हुआ है, तब से लेकर 2018 चौथा सबसे गर्म वर्ष रहा है और नासा का अनुमान है कि मौजूदा वर्ष 2019 और भी यादा गर्म होने वाला है और वाकई गर्मी का प्रकोप जारी है। भारत में इस साल मार्च, अप्रैल और मई के महीनों में मानसून-पूर्व बारिश में 21 फीसदी की कमी दर्ज की गई है जो पिछले 65 सालों के इतिहास में दूसरी सबसे यादा हानि है और कयास है कि मानसून दो सप्ताह से यादा देरी से आएगा। इस बीच तापमान बढ़ता ही जा रहा है। राजस्थान के चुरु में पारा पहले ही 50 डिग्री सेल्सियस पार कर चुका है और यहां तक कि दिल्ली में गर्मी ने नया रिकॉर्ड यानी 48 डिग्री छू लिया है।
पहले ही देश का लगभग 43 फीसदी हिस्सा सूखे की चपेट में है और तकरीबन 60 करोड़ लोग इसकी मार झेल रहे हैं। तापमान के लगातार बढऩे से पानी के स्रोत सूखते जा रहे हैं। ‘द गार्जियनÓ ने अपनी रिपोर्ट में कहा है : ‘जहां तक नजर जाती है वहां तक सूखी धरती देखने को मिल रही है, ऐतिहासिक सूखे की मार झेल रहे कई सौ गांवों के लोगों को पानी की कमी ने अपने घर-बार छोड़कर पलायन करने को मजबूर किया है।Ó महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में लगातार चले आ रहे सूखे का कहर इस कदर बरपा है कि लगभग 50,000 किसानों को पशुओं की खातिर लगाए गए 500 राहत शिविरों में शरण लेनी पड़ी है। पूरे महाराष्ट्र में, जिसका लगभग 72 प्रतिशत भाग सूखे की चपेट में है, ऐसे 1501 पशु राहत शिविर स्थापित किए गए हैं। रिपोर्ट बताती है कि हालात इस कदर खराब हैं कि स्वयं राजधानी मुंबई से सटे कई गांव एक के बाद एक वीरान होते जा रहे हैं। पड़ोसी कर्नाटक राय अपने 88 फीसदी अत्यंत सूखे वाले भूभाग के साथ किसी तरह खींचतान कर काम चला रहा है। इसके कुल 176 जिलों में से 156 जिले सूखाग्रस्त घोषित हो चुके हैं और पिछले 18 सालों में 12 साल इस राय ने सूखा भुगता है।
वर्ष 2018-19 के लिए कर्नाटक के आर्थिक सर्वे में कृषि क्षेत्र में विकास दर ऋणात्मक 4.8 फीसदी दर्शाई गई है। जहां सूखे ने न केवल कर्नाटक में बल्कि लगभग आधे देश में खेतों में खड़ी फसलों का अत्यंत नुकसान किया है, इससे कृषि-आधारित आर्थिक गतिविधियां ठप होकर रह गई हैं। इतना कुछ होने पर अब कहीं जाकर लगातार कम होते भूमिगत जलस्तर को बचाने की तरफ यथेष्ट ध्यान दिया जा रहा है। पानी के बंटवारे को लेकर जहां एक ओर रायों के बीच कटु विवाद हैं वहीं इन सूबों के अंदर विभिन्न वर्गों के बीच प्राप्त जल को लेकर खींचतान है। पिछले कई सालों से पानी के लिए लोगों की कतार लगातार लंबी होती जा रही है। नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि देश के 21 शहरों में वर्ष 2020 तक भूमिगत पानी लगभग खत्म हो जाएगा। इस सूची में चार बड़े महानगर बेंगलुरू, चेन्नई, हैदराबाद और दिल्ली शामिल हैं। चूंकि भूमिगत जल पानी की 40 फीसदी जरूरतों को पूरा करता है, इसलिए इस संकट से 60 करोड़ लोग प्रभावित होंगे।
तथ्य यह है कि इस संपदा के अंधाधुंध दोहन की वजह से सीमित अवधि का सूखा भी कहीं यादा मारक सूखे में बदल गया है। देशभर में अधिकांश जगहों पर भूमिगत जलस्तर 0.5 मीटर प्रतिवर्ष की दर से नीचे जा रहा है और कुछ स्थानों पर यह गिरावट 1 मीटर सालाना है। इस तंगी में लगातार सिकुड़ती नदियों की धारा ने पानी संकट को चिंताजनक स्तर पर पहुंचा दिया है। रिपोर्टें बताती हैं कि नर्मदा जैसी बड़ी नदी का पानी जो वर्ष 2007-17 के बीच 30.48 मिलियन हेक्टेयर था, वह 2017-18 के बीच घटकर 14.80 मिलियन हेक्टेयर रह गया है।
जल संसाधन मंत्रालय के अनुमान के मुताबिक देश के 91 बड़े जलाशयों में पानी का स्तर अपनी पूर्ण समर्था का केवल 18 प्रतिशत रह गया है। इसके अलावा अनेक बांधों के पानी का रुख खेतों की बजाय शहरों की जरूरतें पूरी करने के लिए बदला जा रहा है। इसमें पीने योग्य पानी भी शामिल है। इससे किसानों के प्रदर्शन बढ़ते जा रहे हैं।
पिछले कुछ सालों से ध्यान पानी के संचयन की बजाय बरसाती पानी को इक_ा करने और भूमिगत जलस्रोतों में आई कमी की भरपाई करने की ओर दिया जाने लगा है। तालाब जैसी रिवायती जल संग्रहण व्यवस्था जो सूखे से राहत देने में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, को पुनर्जीवित करने की बात मात्र जुबानी-कलामी बनकर रह गई है।
भूमिगत जल का स्तर ऊपर उठाने के लिए ताल-पोखरों की पुनर्स्थापना के उपाय या तो अधूरे-लटके हैं या फिर छोड़ दिए गए हैं। आज भी देशभर में लगभग 2 लाख रिवायती तालाब और पोखर हैं, जिनको पुनर्जीवित करने की जरूरत है। पंजाब, जिसके 138 में से 110 ब्लॉक डार्क जोन (अत्यंत दोहन वाले) करार दिए जा चुके हैं, सूबे में तकरीबन 15,000 तालाब-पोखर और अन्य रिवायती जल संग्रहण ऐसे हैं, जिनमें फिर से भराव होने पर न केवल भूमिगत पानी का स्तर ऊपर उठाने में मदद मिलेगी बल्कि यह पानी सिंचाई के काम भी आएगा। अब तक केवल 54 तालाबों को ही फिर से चालू करने का काम पूरा हो पाया है।
हैरानी की बात है कि राजस्थान में, जहां सदियों से पानी को बचाने की बेहतरीन रिवायती व्यवस्था रही है और बावड़ी-तालाबों को भरने में पानी की एक भी बूंद को बर्बाद करने की अनुमति नहीं थी, वहां भी इस प्रणाली को और यादा सुदृढ़ करने की बजाय ड्रिप-इरीगेशन पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। कर्नाटक में आज भी लगभग 39,000 तालाब-जोहड़ वजूद में हैं, हालांकि इनकी कुल संया का तीन-चौथाई या तो सूख चुका है या कब्जाया जा चुका है या फिर इन्हें सीवरेज के पानी के भराव के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।
हालांकि कर्नाटक राय अपने यहां रिवायती जल संग्रहण विधि ‘कल्याणीÓ और ओडिशा अपनी ‘कत्ताÓ और ‘मुंडाÓ नामक पुरातन जल संचयन व्यवस्थाओं को पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन पानी संग्रहण की सोच पहले जैसी नहीं है। बहुत साल पहले अमेरिका के टेक्सास राय में ‘ए एंड एमÓ यूनिवर्सिटी की यात्रा के दौरान उस वक्त सुखद हैरानी हुई जब मैंने पाया कि कैसे वहां तमिलनाडु की पुरातन जल संग्रहण विधि और व्यवस्था का अनुसरण करते हुए बारिश के पानी को इक_ा किया जाता है। ‘सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंटÓ ने ‘डाइंग विस्डमÓ नामक पुस्तक प्रकाशित की है। इसमें तमाम रिवायती वर्षा जल संग्रहण प्रणालियों, विधियों और व्यवस्थाओं का जिक्र है।
नलकूप वाले इस जमाने में हमारा यादा जोर रिवायती वर्षा जल संग्रहण एवं दोहन व्यवस्था को वापस अपनाने पर होना चाहिए। भूमिगत जल संरक्षण के प्रयास करने की तुरंत जरूरत है। किंतु यह प्रयास अपने आप में नाकाफी हैं जब तक कि प्रगति के नाम पर वनों, जल स्रोतों एवं जल संग्रहण क्षेत्र को नष्ट करने का काम रुक नहीं जाता।
००
