March 7, 2026

इमरान पर मेहरबान ट्रम्प

( आखरीआंख )
ट्रंप मेहरबान तो इमरान पहलवान! आज की तारीख़ में पाकिस्तान की घरेलू राजनीति में प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की ताक़त बढ़ी है, यह दिखाया जाने लगा है। अमेरिका से लौट आने पर पाकिस्तान में इमरान ख़ान का स्वागत जिस तरह से उनके सांसद कर रहे हैं, उससे इसकी झलक मिलने लगी है। अमेरिका से प्राप्त यह ताक़त देश में 40 अतिवादी समूहों के सफाये में इमरान ख़ान लगा पायेंगे आने वाले दिनों में इसी सवाल से उन्हें बावस्ता होना है। पाकिस्तान की निगाह से देखें तो प्रधानमंत्री इमरान ख़ान की यह यात्रा अभूतपूर्व रही है। उनकी इस सफल यात्रा में एक तीर से दो शिकार हुए हैं। पहला, इमरान कश्मीर मामले में तीसरे पक्ष का मार्ग प्रशस्त कर आये हैं, दूसरा ट्रंप और पीएम मोदी के बीच दरार भी दरपेश कर आये हैं।
इस सवाल का पटाक्षेप इतनी जल्दी नहीं होना है कि ट्रंप ने कश्मीर मामले पर पीएम मोदी को लपेटने की चेष्टा क्यों की। वो अपने बयान में किसी तरह का संशोधन भी नहीं कर रहे। बुधवार को एक तरफ संसद में रक्षामंत्री राजनाथ सिंह स्पष्ट कर रहे थे कि पीएम मोदी ने कश्मीर पर ट्रंप से मध्यस्थता की कोई बात नहीं कही थी, दूसरी तरफ़ ट्रंप के मुख्य आर्थिक सलाहकार लैरी कुडलोव पत्रकारों से बोल रहे थे कि प्रेसिडेंट ट्रंप ने जो कहा, वह दुरुस्त था, आप सवाल ही ग़लत कर रहे हो। अब यह देखने की बात है कि प्रधानमंत्री मोदी इस विषय पर वक्तव्य देते हैं या नहीं। या फिर लोकसभा का सत्रावकाश उनके वक्तव्य के बग़ैर कहीं घोषित न हो जाए।
इसे ध्यान से देखा जाना चाहिए कि मोदी पार्ट-वन शासन में ट्रंप से रिश्ते मधुर रहे हैं। वह भी तब, जब उनके मित्र बन चुके बराक ओबामा से रिश्ते निजी हो चुके थे। यह वही ट्रंप हैं, जो पेरिस सम्मेलन में अपने पूर्ववर्ती द्वारा पर्यावरण में सहयोग करने के फैसले से मुकर गये। ईरान के साथ समझौते को पलट दिया, मगर भारत के साथ उभयपक्षीय संबंधों को पटरी से नहीं उतारा। ठीक से देखा जाए तो भरोसे का भूस्खलन जी-20 की ओसाका बैठक के पहले से आरंभ हो चुका था। मोदी-पार्ट टू की शुरुआत में ऐसा क्यों होने लगा यह विवेचना का विषय है।
अमेरिकी विदेशमंत्री माइक पोम्पियो के दिल्ली आने से पहले ट्रंप के गु़स्से वाले ट्वीट से लगता था कि भारत 28 वस्तुओं पर बढ़ाये कर को डरकर कम कर देगा। मगर ऐसा कुछ हुआ नहीं। अमेरिका ने भारत को बिना बताये व्यापारिक वरीयता सूची (जीएसपी) से बाहर किया था। कायदे से उसे पहले वापिस लेना था। विकासशील देशों को अमेरिका में सस्ता सामान भेजने के वास्ते 1976 में ‘जीएसपीÓ की सुविधा दी गई थी, उसका लाभ 120 देश ले रहे थे। अमेरिका को जिस देश को हल्का-फुल्का झटका देना होता है, उसे इस सूची से बाहर कर देता है, फिर उसे वापिस भी ले लेता है। भारत को इस वजह से अपने निर्यात अमेरिका में बेचने के वास्ते 10 फीसद अतिरिक्त शुल्क देना पड़ रहा है। भारत ने 16 जून 2019 को बादाम, अखरोट, दालों समेत 28 अमेरिकी वस्तुओं पर कस्टम ड्यूटी बढ़ाने का फैसला किया, जिससे चिढ़कर ट्रंप ने अपने ट्वीट में कहा कि यह स्वीकार्य नहीं है, इसे फौरन वापिस लें। तो क्या इसे भी चीन की तरह भारत से अमेरिका का ट्रेड वार मान लें
ओसाका बैठक के फौरी नतीज़े अगर नहीं दिख रहे थे तो मानकर चलना चाहिए था कि संबंधों में किरकिरी की शुरुआत हो चुकी थी। ट्रंप चाहते थे कि फिफ्थ जेनरेशन की फाइव-जी तकनीक बेचने के वास्ते भारत द्वार खोल दे। इसमें तो समय लगना है। ट्रंप ने ओसाका बैठक के समय कहा भी कि भारत में फाइव-जी के एक अरब ग्राहक हैं, जो दुनिया में दूसरा स्थान रखते हैं। ट्रंप भारत में ई-कामर्स के दरवाज़े और खोलना चाहते थे। और तीसरा था रूस से एस-400 प्रक्षेपास्त्र सुरक्षा प्रणाली की खऱीद रद्द कर अमेरिकी प्रणाली के रास्ते प्रशस्त करना। यानी, जो कुछ फैसला भारत ले, ट्रंप की मर्जी से ले। ऐसा होता है क्या और वह भी पीएम मोदी को बदनाम करके।
ओसाका बैठक में कश्मीर पर मध्यस्थता के बारे में यदि बात हुई थी तो उस समय ट्रंप ने उसका खुलासा क्यों नहीं किया क्या ट्रंप उस अवसर की तलाश में थे कि इमरान ख़ान उनके दर पर आयेंगे, तभी कश्मीर कार्ड खेलेंगे। यह तो कूटनीतिक क्षुद्रता है। शायद ही किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने कश्मीर कार्ड को इस तरह से खेलने की चेष्टा की हो। सवा साल बाद नवंबर 2020 में अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव हैं। इसे ध्यान में रखकर ट्रंप अपनी भू-सामरिक नीति में बदलाव चाहते हैं। इस समय अफग़ानिस्तान, ईरान उनकी इस रणनीति का एपीसेंटर बन गया है। अमेरिकी वोटरों को वह जता चुके हैं कि मैंने उत्तर कोरिया जैसे ‘पागल हाथीÓ को काबू कर लिया है।
ऐसा दिखने लगा है कि अमेरिकी फौज की वापसी से पहले अफग़ानिस्तान-पाकिस्तान सीमा पर सक्रिय आतंकी समूहों का उन्मूलन ट्रंप के एजेंडे में है। इमरान ख़ान ने 40 अतिवादी समूहों के फलने-फूलने का जो जिक्र किया, यह उसी रणनीति का हिस्सा है, ताकि अमेरिका इनके उन्मूलन में विशेष पैकेज की घोषणा करे। अमेरिकी कांग्रेस में इमरान ख़ान की जिस तरह से वाहवाही हुई है। स्पीकर नैंसी पावेल ने जिस अंदाज़ में पाक प्रधानमंत्री के वास्ते कसीदे काढ़े, उससे यह बदलाव दिखने लगा है कि इमरान ख़ान जैसे ‘मोहरेÓ का इस्तेमाल अमेरिका आने वाले दिनों में करने वाला है।
एक बात तो स्वीकार करनी पड़ेगी कि अमेरिकी सांसदों के पाकिस्तानी कांग्रेसनल ग्रुप की प्रमुख शैला जैक्सन व्हाइट हाउस को आईने में उतार पाने में सफल रही हैं। अफ्रीकी मूल की इस महिला सभासद के ग्रुप में 50 सांसद बताये जाते हैं। इन्होंने इस बार माहौल बनाया कि पाकिस्तान खु़द ही आतंकवाद का शिकार हो गया। इसी तर्ज पर इमरान ख़ान यूएस कांग्रेस में बोले भी कि हमारे 70 हज़ार नागरिक मारे जा चुके हैं।
सवाल यह है कि इसे काउंटर करने के वास्ते अमेरिकी कांग्रेस में जो भारतीय कॉक्स है, वह कमज़ोर क्यों पड़ गया इमरान के जाने से पहले क्या इंडियन कांग्रेसनल कॉक्स को इसकी हवा नहीं लगी कि खेल क्या होने वाला है यह तो हमारी कूटनीतिक विफलता है कि जो कुछ पाकिस्तान लॉबी वहां चाह रही थी, उसमें कामयाब रही। हम इस बात पर मुग्ध थे कि हाफिज़ सईद पर कार्रवाई की गई है। यह इमरान के व्हाइट हाउस जाने से पहले की पृष्ठभूमि थी!