March 4, 2026

त्वरित टिप्पणी:.  प्रदेश के नेताओं में सत्ता की भूख आम लोगों पर भारी पडऩे लगी 

अनिल सती
क्या अस्थिरता आज उत्तराखण्ड राज्य की नियति बन गयी है, दो दिनों से जिस तरह से शोसल मीडिया और अन्य माध्यमों में फिर से एक बार सीएम बदलनने की खबर चर्चाओं में है और कांग्रेसी नेता हरीश रावत का सोसल मिडिया में ट्वीट किया जाना भी यही संकेत दे रहा है कि राज्य में अस्थिरता कायम है। यदि एक बार  फिर से यहां नेतृत्व परिवर्तन होता है तो यह बात सच साबित हो जाएगी। ऐसे यह राज्य राजनीति की प्रयोशाला से कम नहीं होगा।
सदियों से उपेक्षा का दंश झेल रहे इस पर्वतीय राज्य के लोगों को उम्मीद थी कि अलग राज्य बनने से उनके सपने साकार होंगे, लेकिन राज्य गठन के गुजरे 16 सालों में यहां जड़ जमा चुकी राजनीतिक अस्थिरता ने सभी को निराश किया है। आजाद भारत में कई प्रदेशों को गठन हुआ है, लेकिन तेलंगाना के साथ उत्तराखंड ऐसा इकलौता राज्य है जहां लोगों ने राज्य निर्माण के लिए अपने प्राणों की आहुति दी है।  लंबे संघर्ष और कुर्बानियों से मिले उत्तराखंड में पूत के पांव पालने में ही दिखने लगे। मात्र डेढ़ साल की अंतरिम सरकार में राज्य की जनता को नित्यानंद स्वामी और भगत सिंह कोश्यारी के रुप में दो-दो सीएम देखने पड़े।
बाद में भले ही एनडी तिवारी ने पूरे 5 साल सरकार चलाई हो, लेकिन इन पांच सालों में भी राजनीतिक उठा-पटक हर वक्त देखने को मिली। हर वक्त यहां एन डी तिवारी को बदलने के  लिए कांग्रेस का एक खेमा लगा रहा और इसका परिणाम यह हुआ कि विकास पुरूष के नाम से जाना जाने वाला शख्स भी मुख्यमंत्री रहते हुए राज्य को विकास के पायदान पर कुछ खास आगे नहीं ले जा सका। किसी तरह से पांच साल  पूरे हुए और फिर 2007 में विधानसभा चुनाव आए। यहां के लोगों को भाजपा को सत्ता सौंपी और भाजपा ने पूर्व सैन्य अधिकारी मेजर जनरल बीसी खण्डूडी को कमान सौंप दी। लेकिन 2007 में भाजपा के सत्ता के आने के बाद तो ये राज्य राजनैतिक अस्थिरता का केंद्र ही बन गया। उस दौरान आपसी खींचतान के चलते भाजपा शासन ने राज्य को तीन सीएम दे डाले। किसी तरह से पांच साल खिंचे और फिर से 2012 में विधान सभा चुनाव हुए। राज्य के लोगों ने कांग्रेस को सत्ता  सौंपी और विकास की बाट जोहने लगे। कांगेे्रस ने विजय बहुगुणा को सीएम बनाया और सरकार चल पड़ी लेकिन इस सरकार की उड़ान भी कुछ ही दिन में थम गयी और यहां एक बार फिर से सीएम को बदलने की कवायद शुरू हो गयी। और फिर कुछ ऐसा ही नजारा कांग्रेसी सरकार में दिखाई दिया। विजय बहुगुणा को हटा कर हरीश रावत को कमान सौंप दी गयी।
इन चार सालों में भी जहां कांग्रेस ने विजय बहुगुणा और हरीश रावत के रूप में दो सी एम दिए। वहीं, पहली बार प्रदेश की जनता को राष्ट्रपति शासन भी देखना पड़ा था। फिर किसी तरह से हरीश रावत ने राज्य के विकास को पर लगाने की कोशिश की लेकिन उनकी ये कोशिश भी कामयाव नहीं हो पायी। फिर से 2017 में विधानसभा चुनाव आए और कांग्रेस की सत्ता से बेदखली हो गयी। भाजपा को सत्ता मिली और त्रिवेन्द्र सिंह रावत को सीएम की कुर्सी मिल गयी। लेकिन दो साल से अधिक के कार्यकाल में राज्य का विकास कहीं दिखा नहीं अलबत्ता कुछ खास लोगों को लाभ पहुंचाने के अलावा सरकार ने आम आदमी के  लिए कुछ नहीं किया। और अब राजधानी दिल्ली के चुनाव के बाद एक बार फिर से यहां नेतृत्व परिवर्तन की बहस के साथ ही चर्चा शुरू हो गयी। कहा जा रहा है कि अब सत्ता की कमान सतपाल महाराज या रमेश पोखरियाल निशंक को सौंपी जा सकती है। यदि ऐसा होता है तो यह राज्य राजनीति की प्रयोगशाला से कम नहीं है।
राजनीतिक मामलों के जानकारों का कहना है कि प्रदेश के नेताओं में सत्ता भूख आम लोगों पर भारी पडऩे लगी है। यहां के राजनेताओं में समाई सत्ता की भूख ने राज्य की अवधारणा को ही तार-तार कर दिया है। विषम भूगोल वाले इस राज्य का निर्माण क्षेत्रीय विषमताओं के आधार पर हुआ था।उम्मीद थी कि स्थानीय नेताओं के हाथों बागडोर आने पर राज्य विकास की मुख्यधारा में शामिल होगा, लेकिन गुजरे 19 सालों में यहां जारी सत्ता के तांडव ने सभी सपने चकनाचूर किए हैं। विकास की छटपटाहट से निकले उत्तराखंड की राजनीतिक सूरत इस कदर बदतर होगी ये शायद ही किसी सोचा था। गुजरे 19 सालों में यहां विकास की गंगा बहाने के दावे तो पूरी तरह फैल हुए हैं, लेकिन राजनेताओं के स्वार्थ ने एक बार फिर रिकॉर्ड कायम किया है।

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