लापरवाह समाज, गैर जिम्मेदार सत्ता तंत्र
सही सबक न सीखने की तो हमारी फितरत पुरानी है। अभूतपूर्व, और अबूझ भी, जानलेवा वैश्विक महामारी कोरोना के प्रति भी वैसा ही रवैया अब आत्मघाती साबित होता नजर आ रहा है। कारगर दवा तो दूर, जरूरी दवाएं, अस्पताल में बेड, और जरूरत पडऩे पर वेंटिलेटर-ऑक्सीजन तक आम आदमी को उपलब्ध नहीं हैं। अस्पताल में जगह न मिल पाने से मरीज एंबुलेंस या बाहर सड़क पर ही दम तोड़ रहे हैं तो ऑक्सीजन की कमी से अस्पताल में। नजर आते हैं तो अपनों के इस तरह काल कवलित होने पर विलाप करते-व्यवस्था को कोसते परिजन। कभी विश्व गुरु रहे और अब विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत को शर्मसार करने के लिए अगर यही काफी न हो तो निष्पक्षता से लिखे गये इतिहास में अविश्वसनीय, मगर सच, यह तथ्य भी दर्ज होगा कि समाज की लापरवाही और सत्ता तंत्र की गैर जिम्मेदारी के चलते बेकाबू हो गये कोरोना संकट के परिणामस्वरूप शवों के अंतिम संस्कार के लिए भी जगह कम पड़ गयी थी।
नहीं, यह पाषाणकालीन भारत की तस्वीर नहीं है। मध्ययुगीन व्यवस्था की बात भी नहीं है। यह हृदयविदारक तस्वीर है इक्कीसवीं शताब्दी के भारत की, जिसमें कभी लोगों को फिर से विश्व गुरु बनाने के सपने दिखाये गये तो कभी आर्थिक महाशक्ति, लेकिन बने क्या बेशक संकट वैश्विक है, लेकिन महज एक साल के संकटकाल ने हमारे समाज और सत्तातंत्र के खोखलेपन को उजागर कर दिया है। बता दिया है कि आजादी के सात दशक बाद भी हम न तो जिम्मेदार समाज बन पाये और न जवाबदेह सत्तातंत्र। इससे बड़ी नाकामी दूसरी नहीं हो सकती। हर चीज की भरपाई संभव है, लेकिन व्यवस्थागत लापरवाही से गयी जान की न तो भरपाई संभव है और न ही उससे बड़ा कोई अपराध हो सकता है, पर क्या किसी को इसका अहसास भी है
चीन के वुहान प्रांत में कोरोना की आहट दिसंबर, 2019 में ही सुनायी पड़ गयी थी। उस आहट को सुन कर कई देशों की सरकारें जागीं और जरूरी एहतियाती कदम भी उठाये, लेकिन हम अनेकानेक ज्ञात-अज्ञात कारणों से मार्च, 2020 तक सोये रहे। इस बीच 30 जनवरी को ही हमारे यहां भी कोरोना का पहला मरीज पहुंच गया था, लेकिन हमने विदेशों से आने वाली उड़ानों पर पाबंदी तो दूर, यात्रियों की कारगर जांच और उन्हें 14 दिन तक क्वारंटीन रखने जैसे एहतियाती कदम उठाना भी जरूरी नहीं समझा। जैसा कि देर से जागने पर होता है, हड़बड़ाहट में बिना जरूरी तैयारी के 50 दिन लंबे लॉकडाउन जैसा कदम उठाया, जिसके वांछित परिणामों पर तो अभी तक बहस जारी है, लेकिन नकारात्मक प्रभाव सबके सामने हैं। लॉकडाउन के चलते शहरों से गांवों को हुए पलायन और उसकी पीड़ा की तुलना उम्रदराज लोगों ने विभाजनकालीन परिस्थितियों से की है, तो गलत नहीं है। सुरक्षित वातानुकूलित कमरों में बैठ आंकड़े और प्रवचन देना आसान है। जाके पांव न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई! उनके जख्मों पर जो थोड़ा-बहुत मरहम लगा भी था तो उसका श्रेय सामाजिक संस्थाओं और दयाशील लोगों को जाता है। कड़वा सच यही है कि कुछ लोगों के बैंक खातों में पैसा जमा होने और थोड़ा-बहुत मुफ्त राशन मिलने के अलावा सरकारी तंत्र उस अभूतपूर्व संकटकाल में कहीं संबल देता तो नहीं दिखा।
यह उस दंश का भी असर है कि इस बार कोरोना संकट पिछले साल से भी भयावह हो जाने के बावजूद खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राज्यों को सलाह दे रहे हैं कि लॉकडाउन को अंतिम विकल्प ही मानें तो राज्य भी लॉकडाउन का साहस नहीं जुटा पा रहे। फिर भी कुछ राज्यों में लॉकडाउन की आहट मात्र से शहरों से प्रवासी मजदूरों के हुजूम गांव लौटने लगे हैं और इस बार उनकी कहीं कोई जांच भी नहीं हो रही। पिछले साल लॉकडाउन को ही कोरोना की शृंखला तोडऩे का रामबाण उपाय मानने वाली सरकारें इस बार इस शब्द से ही परहेज कर रही हैं तो इसका कारण जान से ज्यादा जहान की चिंता ही है, क्योंकि जहान के खतरे में पडऩे का असर भी अंतत: जान पर ही पड़ता है। लॉकडाउन का ऐलान करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा था कि हर जान बचानी है, और जब क्रमबद्ध अनलॉक शुरू हुआ, तब कहा था कि जान के साथ जहान भी बचाना है, पर बचा क्या जिस जीडीपी के आंकड़ों को सरकारें अर्थव्यवस्था और अपनी उपलब्धियों का भी पैमाना बता कर पीठ थपथपाती रही हैं, उसकी दर पहली बार लगभग 24 प्रतिशत तक ऋणात्मक हो गयी। राज्यों से लेकर केंद्र सरकार तक के राजस्व के स्रोत इस कदर सूखने लगे कि शराब और पेट्रोलियम पदार्थों पर मनमाने शुल्क और सेस से भरपाई अभी तक जारी है। और जान भी कहां बची
पिछले साल मार्च से शुरू हुआ कोरोना का कहर अलग-अलग राज्यों में सितंबर-नवंबर में चरम पर पहुंचा। जनवरी-फरवरी में नये केसों की कम होती संख्या से उम्मीद जगी थी कि कोरोना अभी पूरी तरह खत्म न भी हो, पर उसका आतंक खत्म हो जायेगा। शायद हो भी जाता, अगर यूरोप समेत विदेशों में आयी कोरोना की दूसरी लहर से सबक लेकर समाज और सरकार, दोनों ने विवेक सम्मत जिम्मेदार आचरण-व्यवहार किया होता। तमाम कारणों से कोरोना की लहर में आये उतार के लिए सरकारें अपनी पीठ थपथपाने में व्यस्त हो गयीं तो बड़ी संख्या में आबादी भी कोरोना विजेता की मुद्रा में तमाम जरूरी सावधानियों को धता बता कर बाजारों-सड़कों पर घूमने लगी। हालांकि वैज्ञानिक अध्ययन और चिकित्सा विशेषज्ञ बार-बार आगाह कर रहे थे कि भारत में भी अन्य देशों की तरह कोरोना की दूसरी लहर आ सकती है, जो सावधानी में लापरवाही बरतने पर अधिक मारक भी साबित हो सकती है। क्या ठीक वैसा ही नहीं हो रहा है सवाल पूछा जा सकता है कि आखिर 50 दिन के लॉकडाउन और लगभग साल भर के कोरोना काल में सरकार ने जरूरी मेडिकल सुविधाओं के विस्तार के लिए क्या ठोस कदम उठाये
सरकारें आंकड़ों की बाजीगरी में माहिर होती हैं। आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि उनके दावे ऐसे सवाल और आरोप के ठीक विपरीत होंगे, लेकिन हर रोज बढ़ते नये केस और मौत के आंकड़े उन पर सवालिया निशान ही लगाते हैं। हमारी सरकारें और उनका नेतृत्व करने वाले राजनीतिक दल-नेता कोरोना के कहर के प्रति कितने गैर जिम्मेदार हैं, बिहार से लेकर पश्चिम बंगाल तक के विधानसभा चुनाव इसका उदाहरण हैं। विश्व के कई देशों में कोरोना के खतरे के मद्देनजर चुनाव टाले गये, पर हम तो जीते ही उस राजनीति में हैं, जो चुनाव और सत्ता तक सीमित है, जनता तो इस खेल में मोहरा भर है। जनता को कोविड से सुरक्षा नियमों के पालन का प्रवचन देने वाले नेता उन्हें ही ताक पर रखकर जिस तरह चुनाव प्रचार में जुटे रहे, उसने भी जन साधारण को लापरवाह बनाने में कम भूमिका नहीं निभायी। जनता को लगा कि जब चुनावी रैलियों –रोड शो में कोई कोविड नियमों का पालन नहीं कर रहा, फिल्मों-टीवी सीरियल की शूटिंग शुरू हो गयी है, खेल-तमाशे हो रहे हैं, स्कूल-कालेज से लेकर मॉल-जिम-सिनेप्लेक्स तक सब कुछ खुल गया है तो फिर उसे ही क्यों डरा कर घरों में रहने को कहा जा रहा है। पर यह तर्क नहीं, कुतर्क था, जिसकी कीमत भी अब जनसाधारण को ही चुकानी पड़ रही है। पुराने अनुभव ने लॉकडाउन को बहुत बुरा शब्द बना दिया है। इसलिए सरकारें मजबूरी में ही उस हद तक जायेंगी, लेकिन जैसा कि समझदार चिकित्सा विशेषज्ञ बार-बार कह रहे हैं कि जान बचानी है तो अनावश्यक घर से बाहर न निकलें—और कोविड उपयुक्त व्यवहार को अपनी जीवनशैली का अभिन्न अंग बना लें, वरना दूसरी के बाद तीसरी लहर भी आ सकती है, जबकि सरकारी सोच और तंत्र की सीमाएं दो लहरों में ही पूरी तरह बेनकाब हो चुकी हैं।
