May 7, 2026

गृह युद्ध की ओर बढ़ते अफगानिस्तान की त्रासदी जी. पार्थसारथी

भारतीयों में आमतौर पर यह सोच है कि अफगानिस्तान में एक ही किस्म की विचारधारा व्याप्त है। यानी तालिबान देश का अधिकांशत: प्रतिनिधित्व करते हैं, लेकिन यह गलत है। तालिबान एक पश्तून बहुल गुट है, जिनकी गिनती कुल जनसंख्या का अमूमन 45 फीसदी है। तालिबान का नेतृत्व और कारकुन अपनी पाकिस्तानी पनाहगाहों से निकलकर अफगानिस्तान लौट आया है, ठीक वैसे ही, जब फरवरी, 1989 में सोवियत सेना की अफगानिस्तान से वापसी होने लगी थी। जनरल जिया-उल-हक के समय में अत्यंत कट्टरवादी मदरसों में तैयार और दिमागों में एक विचारधारा विशेष भर दिए गए तालिबान ने सोवियत पलायन के बाद अफगानिस्तान में बने राजनीतिक एवं सुरक्षा शून्य को भरना चाहा था। सत्ता प्राप्ति के बाद तालिबान ने अफगानिस्तान में जो आतंक और जुल्मो सितम ढहाए, वे अनोखे थे।
उस वक्त भी तालिबान को मुल्क से लगभग हर दूसरे जनजातीय गुट से सशस्त्र विरोध का सामना करना पड़ा था। इसकी अगुवाई ताजिक कर रहे थे, जिनकी जनसंख्या अफगान आबादी में लगभग 35 प्रतिशत है। जल्द ही तालिबान के राज वाला अफगानिस्तान दुनियाभर के कट्टरपंथी इस्लामी आतंकी गुटों के लिए सुरक्षित पनाहगाह बन गया। अफगानिस्तान में अमेरिकी दखल न्यूयार्क और वाशिंगटन में 9/11 के आतंकी हमले के बाद हुई थी। अफगानिस्तान से खदेड़ दिए जाने के बाद तालिबान ने पाकिस्तान स्थित अड्डों से गतिविधियां जारी रखीं। हैरानी की बात है कि अमेरिकी प्रशासन पाकिस्तान के उन दावों को आंखें मूंदकर मान रहा था, जिसमें वह खुद को बेकसूर बता रहा था, यह सब आईएसआई द्वारा तालिबान के सीमापारीय आतंकवाद को साक्षात मदद एवं शह देते हुए देखने के बावजूद हुआ। अमेरिका ने पाकिस्तानी सरकार को हर किस्म की उतनी आर्थिक एवं सैन्य मदद दी, जितनी वह जज्ब कर सकता था। लेकिन फिर भी तालिबान ने आईएसआई से मिलकर आतंकी गुटों जैसे कि जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा के साथ अपने संबंध बनाए रखे।
तथापि अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना की उपस्थिति न तो तालिबान को डिगा पाई, न ही तालिबान को दुनियाभर के उन आतंकी गुटों के साथ अपने संबंध मजबूत रखने से रोक पाई, जिनको उसने अफगानिस्तान स्थित सुरक्षित अड्डों में पनाह दी थी। इन गुटों में अल कायदा, इस्लामिक स्टेट, तहरीक-ए-तालिबान (पाकिस्तान) और चीन के शिनजियांग प्रांत में गतिविधियां चलाने वाले ईस्ट तुर्कमेनिस्तान इंडीपेंडेंस मूवमेंट (ईटीआईएम) इत्यादि हैं। हालांकि तालिबान ने चीन को भरोसा दिया था कि वह सशस्त्र विद्रोही गतिविधियां छोड़ कर अफगान सरकार के साथ शांति बनाना चाहता है, लेकिन यह हुआ नहीं। पाकिस्तान ने जहां एक तरफ अमेरिकियों को सब्ज़बाग दिखाए रखे वहीं न्यूयार्क और वाशिंगटन पर हुए 9/11 हमलों के मास्टरमाइंड ओसामा बिन लादेन को सुरक्षित पनाह मुहैया करवाए रखी।
तालिबान नेतृत्व ने अफगानिस्तान में अपने भावी निजाम का खाका जाहिर कर दिया है। प्रवक्ता जबी उल्लाह मुज़ाहिद ने हाल ही में घोषणा की है कि तालिबान का राज इस्लामिक शरिया पर आधारित होगा, जिसको ‘सख्तीÓ से लागू किया जाएगा। उसने आगे कहा कि महिलाओं को नाच-गाने की इजाज़त नहीं होगी और वे कुछ ही क्षेत्रों मे काम कर सकेंगी, जहां ‘उनकी अस्मिता से समझौता न होने पाए।Ó घर से बाहर महिला ‘अपनी सुरक्षा निश्चित करनेÓ को केवल पुरुष के साथ ही निकल पाएगी। वहीं मर्द को पश्चिमी लिबास पहनने की इजाज़त नहीं होगी और उन्हें दाढ़ी बढ़ानी होगी। यह भी साफ किया कि चुनाव नहीं होंगे क्योंकि मुस्लिम मुल्कों में इनसे कुछ हासिल नहीं होता है। शरिया के सिद्धांत लागू किए जाएंगे। बतौर एक विकल्प युद्ध से इनकार नहीं किया जा सकता और जिहाद आगे भी जारी रहेगा।
तालिबान का ध्यान पाकिस्तानी सीमा के समीप स्थित कंधार शहर को कब्जाने पर सबसे ज्यादा केंद्रित है। अफगान लोगों के लिए कंधार की कद्र मक्का जितनी है। कहा जाता है कि वर्ष 621 ईस्वी में तत्कालीन अफगान सुल्तान अहमद शाह अब्दाली को बुखारा के दौरे पर वहां के राजा अमीर बेग ने हजरत मोहम्मद का एक चोला भेंट किया था। वह चोला कंधार में अहमद शाह के मकबरे के पास एक मस्जिद में रखा हुआ है। इसलिए इस धर्मस्थल को एक बड़े आध्यात्मिक एवं पवित्र स्थान का दर्जा हासिल है। कभी गुमनाम रहा तालिबान नेता मुल्ला उमर भी उस वक्त मशहूर हुआ था जब वर्ष 1996 में वह कंधार की उक्त मस्जिद के झरोखे में हजरत मोहम्मद के चोले के साथ प्रकट हुआ था।
इस बात का डर जताया जा रहा है कि तालिबान अफगान सेना को चुटकियों में रौंद देंगे। यह छवि भी प्रस्तुत की जा रही है कि अफगान सेना में वह जीवटता नहीं है जो तालिबान चुनौती से पार पा सके। दक्षिणी और पश्चिमी अफगानिस्तान के ईरान और ताजिकिस्तान से लगते सीमांत क्षेत्रों में कुछ इलाका फिलहाल तालिबान के नियंत्रण में है। संघर्ष में पाकिस्तान की लिप्तता साफ जाहिर है, क्योंकि जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा और तहरीक-ए-तालिबान (पाकिस्तान) इत्यादि गुटों के काफी सदस्य अफगान तालिबान की ओर से लड़ाई में शामिल हैं। रूस को अफगान संघर्ष पर चिंता सता रही है कि कहीं इसकी चिंगारियां ताजिकिस्तान जैसे मध्य एशियन मुल्कों तक न पहुंच जाएं। इसी तरह की फिक्र ईरान को भी लगी है कि उसकी सीमा से लगते अफगान इलाके में रहने वाले शिया हज़ारा लोगों पर तालिबान हमला बोल देगा। इसलिए भविष्य में अफगानिस्तान की पश्चिमी सीमाओं पर रूस और ईरान की दखल की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अफगान मुद्दे पर अमेरिका, रूस और अफगानिस्तान के तमाम मध्य एशियाई पड़ोसी मुल्कों के अलावा शंघाई सहयोग संगठन में भी बृहद द्विपक्षीय वार्ता की है। इस सिलसिले में तेहरान में ईरान के आगामी राष्ट्राध्यक्ष इब्राहिम रायसी के साथ हुई जयशंकर की अभूतपूर्व मुलाकात का विशेष महत्व है। ईरान ने हमबिरादर शिया हज़ारा लोगों पर तालिबान के हमले की सूरत में गंभीर नतीजे भुगतने की चेतावनी दे रखी है। अमेरिकी फौज की आमद से पहले, ईरान उस वक्त भी भारत का निकट सहयोगी था जब ईरान-भारत-रूस की मदद वाला ‘नार्थन एलाएंसÓ, जिसमें ज्यादातर लड़ाके गैर-पश्तून अधिसंख्या में थे, तालिबान को कड़ी टक्कर दे रहा था।
अनुमानों के मुताबिक अफगानिस्तान के कुल 424 जिलों में से फिलहाल लगभग 200 पर ही तालिबान का कब्जा हो पाया है। कुल 34 प्रांतों की एक भी राजधानी पर उसका नियंत्रण नहीं बन सका। अमेरिकी फौज की वापसी के बाद अफगान सेना को सैन्य साजो-सामान की भारी कमी है, टैंक और तोपें बहुत कम हैं। अफगान वायुसेना के पास 69 हल्के लड़ाकू हेलीकॉपटरों समेत कुल मिलाकर लगभग 200 का हवाई बेड़ा है। देखना यह है कि क्या पाकिस्तान तालिबान को कंधे पर रखकर छोड़ी जोने वाली वायुयान-मारक स्टिंगर मिसाइलों से लैस करता है या नहीं।
हमारे देश में तालिबान से वार्ता करने की सलाहें दी जा रही हैं, जिनको नजऱअंदाज करके मोदी सरकार ने सही किया है। हालांकि कतर स्थित मुल्ला बरादर जैसे कुछ तालिबान नेताओं से संपर्क रखा जा सकता है। ये वही तालिबान हैं, जिनकी सांठगांठ आईएसआई की मदद वाले लश्कर-ए-तैयबा और जैशे मोहम्मद जैसे गुटों और इंडियन एअरलाइंस की फ्लाइट आईसी-814 के अपहरणकर्ताओं से रही है। पाकिस्तान की इच्छा है कि भारत के खिलाफ ‘रणनीतिक गहराईÓ वाले अभियान चलाने को अफगानिस्तान एक निर्भर एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बदनाम देश बन जाए।