आसान नहीं बड़ा आदमी होना
बच्चे पिता की नहीं सुन रहे साहब, जमाना खराब-सा हो लिया है।
शाहरुख खान कई किस्म के ब्रांडों के इश्तिहारों के ब्रांड एंबेसडर हैं। उनके इश्तिहारों का आशय है कि वह नयी पीढ़ी को संदेश टाइप दे रहे हैं कि फलां पान-मसाला खाकर उस कोचिंग में पढऩे जाना। पर उनका पुत्र विकट नशे के आरोपों में धरा गया है। उनका बेटा न पान-मसाला खाते देखा गया और न ही वो उस कोचिंग में जाते हुए देखा गया, जिसका प्रचार शाहरुख खान करते हैं। यानी कि फिल्म स्टारों के बालक अपने ही बाप की न सुन रहे हैं।
कल को पान-मसाले का इश्तिहार करेंगे शाहरुख खान तो कोई उठकर कह देगा, आपका बेटा तो चरस-अफीम खाये और हमें पान-मसाले पर ही रोक रहे हो खान साहब। ब्रांड एंबेसडर की बहुत आफतें हैं, झूठ साफ पकड़े जाते हैं। शाहरुख खान पान-मसाले की कहते हैं, बालक उनका अफीम-चरस में धरा गया है।
बच्चे ही न सुन रहे हैं तो बाहर वालों को क्यों सुना रहे हो, सवाल यह है। बड़े लोगों के बच्चे नहीं सुनते, बाहर वाले सुन लेते हैं, सच्चाई यही है। बच्चे सिर्फ सुनने से ही इनकार न कर देते, बल्कि न जाने क्या-क्या सुनाने लगते हैं। बाप का कहा मानकर शाहरुख खान के बेटे को सिर्फ पान-मसाला खाना चाहिए। चलो पान-मसाला न खाया, तो कम से कम चरस-अफीम में तो न जाता। बच्चे मनमानी करते हैं। सुनील दत्त बेहद शरीफ इंसान थे, उनके बेटे संजय दत्त ने दुनिया का हर नशा हर ऐब कर डाला। बाप की सुनी ही नहीं।
बड़े आदमियों के बालक गांजा-चरस में कामन इंटरेस्ट रखते हैं। कुल मिलाकर हाल यह है कि बड़े खिलाड़ी, बड़े एक्टर तो कहीं मेहनत कर रहे होते हैं, अपने-अपने कामों में। और बड़े आदमियों के बालक मिलते हैं कहीं क्रूज पर, कहीं किसी होटल में चरस-गांजा पार्टी करते हुए। अगर आदमी अपने बच्चे को सही शिक्षा, सही जीवन-मूल्य सिखाने में कामयाब हो गया तो समझो बड़ा आदमी नहीं है। बड़ा आदमी हो ही न पाया। टाइम बच्चों में ही गला दिया अच्छी बातें सिखाने में। शाहरुख खान के बेटे के साथ बड़े-बड़े उद्योपतियों के बालक भी धरे गये हैं चरस-गांजे में। चरस-गांजे के लेवल पर बच्चे पहुंचे, इतना बड़ा आदमी होना आसान नहीं है।
