April 24, 2026

कब होगा द्यौनाई अस्पताल का 10 बेड में उच्चीकरण ? 20 हजार की आबादी के बीच मौत से जंग, सरकार व जनप्रतिनिधियों की चुप्पी पर सवाल!!

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( अर्जुन राणा )

बागेश्वर गरुड ।“आख़िर हमारे गांव की औरतें कब तक डिलीवरी के लिए पहाड़ से गाड़ियों में लदकर अल्मोड़ा और हल्द्वानी जाती रह जाएंगी?” ये सवाल आज द्योनाई और आस-पास के 11 ग्राम पंचायतों के ग्रामीणों के गले में हड्डी बनकर अटका है।

जनपद बागेश्वर द्योनाई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र को देखने पर लगता हैं कि यह आज खुद आईसीयू में अपनी आखरी साँसे गिन रहा हैं। जिसकी बरामदे से लगी हुई सामने की बहुत ऊंची दीवार कभी भी टूटकर पूरे अस्पताल को अपने चपेट में ले सकती हैं।
यही एक अस्पताल है जो 20 हजार की आबादी के लिए एकमात्र सहारा बना हुआ है।
यहां आने वाले मरीजों के आंकड़े चौंकाने वाले हैं — हर साल 10 हजार से ज्यादा ओपीडी और करीब 1500 मरीज रेफरल होते हैं, लेकिन सुविधा? महज़ 2 बेड, और वो भी बिना पर्याप्त स्टाफ के।

स्टाफ के नाम पर खाली कुर्सियां

शासन से स्वीकृत पदों में 1 फार्मासिस्ट तो है, लेकिन वार्ड बॉय और सफाई कर्मचारी लंबे समय से रिक्त। डॉक्टर का पद भी महीनों से खाली पड़ा है। मतलब ये कि आपात स्थिति में मरीज का इलाज नहीं, सिर्फ़ कागज पर रेफरल मिलता है।

महिला डॉक्टर की सख्त जरूरत

अगर अस्पताल को 10 बेड की स्वीकृति मिल जाए तो 2 डॉक्टर तैनात हो सकते हैं, जिसमें एक महिला डॉक्टर भी होगी। इससे डिलीवरी यहीं हो पाएगी और गर्भवती महिलाओं को पहाड़ों से नीचे शहरों की तरफ भागना नहीं पड़ेगा।
फिलहाल, यहां से गर्भवती महिलाओं को 50 से 150 किलोमीटर दूर रेफर किया जाता है और कई बार ये दूरी मौत और जिंदगी के बीच का फासला बन जाती है।

40 साल की उपेक्षा, जनता का टूटा भरोसा

करीब 40 वर्ष पहले स्थापित इस अस्पताल को वर्ष 2002 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने 2 बेड में उच्चीकृत कर नया भवन दिया था। इसके बाद से ग्रामीणों ने हर सरकार से उम्मीद रखी, लेकिन नतीजा? वादे, घोषणाएं और झूठी तारीखें।
इस बीच, इसी जिले के कपकोट ब्लॉक के उधमस्थल को इस वर्ष उच्चीकृत कर दिया गया, जबकि वहां की आबादी मात्र 5 हजार है। तो सवाल उठना लाज़मी है । क्या द्योनाई की 20 हजार जनता का जीवन इतना सस्ता है?

मांग सिर्फ़ बिस्तरों की नहीं

ग्रामीणों ने स्पष्ट किया है कि उन्हें सिर्फ़ 10 बेड का दर्जा ही नहीं, बल्कि एक एक्स-रे मशीन, पर्याप्त दवाएं और प्रशिक्षित स्टाफ भी चाहिए।
“हम अब चुप नहीं बैठेंगे। अगर मांगे नहीं मानी गईं तो गांव-गांव से लोग सड़क पर उतरेंगे और बड़ा जनांदोलन होगा,” सामाजिक कार्यकर्ताओं ने चेतावनी दी।

राजनीति बनाम जिंदगी

ग्रामीणों का आरोप है कि राजनीतिक दल केवल वोट बैंक के लिए आते हैं और चुनाव बीतते ही वादों का पोस्टर भी उखड़ जाता है।
“हमारे गांव में चुनावी भाषण खूब होते हैं, लेकिन अस्पताल के लिए मशीनें और डॉक्टर कभी नहीं आते, यहाँ तक कि ग्राम प्रधान से लेकर विधायक व सांसद भी अपने हर चुनाव में इसका जिक्र करते रहते हैं” एक बुजुर्ग ग्रामीण ने गुस्से में कहा।

अब फैसला शासन को करना है

द्योनाई की जनता अब आर-पार के मूड में नजर आती है। उनकी मांग सीधी है कि

अस्पताल को तुरंत 10 बेड में उच्चीकृत किया जाए

कम से कम 2 डॉक्टर (एक महिला डॉक्टर सहित) तैनात हों

एक्स-रे मशीन और लैब की सुविधा दी जाए

रिक्त पदों पर तुरंत भर्ती हो

क्योंकि अब खेल वोट बैंक या स्वास्थ्य सेवाओं का नहीं, लोगों की जिंदगी का है।
अगर सरकार ने समय रहते कदम नहीं उठाए तो द्योनाई क्षेत्र से एक बहुत बड़ी आंदोलन की चिंगारी कभी भी जन्म ले सकती हैं जिसकी आंच पूरे जिले तक जाने में देर नही लगेगी ।