पत्थरों में छिपा सदियों पुराना इंजीनियरिंग का राज, सुनारा गांव में स्थित संरचना के संरक्षण की मांग
उत्तरकाशी । बड़े-बड़े पत्थर, न सीमेंट, न लोहे की छड़ें और न ही आधुनिक मशीनें… फिर भी पत्थरों को एक-दूसरे के ऊपर इस तरह संतुलित कर तैयार की गई संरचना आज भी सुनारा गांव में मौजूद है। सदियों पुरानी मानी जा रही यह अनोखी पत्थर संरचना स्थानीय लोगों के लिए रहस्य और कौतूहल का विषय बना है। ग्रामीणों ने इसके संरक्षण के साथ ही इतिहास और निर्माण तकनीक का वैज्ञानिक अध्ययन कराने की मांग की है। गांव के एक छोर पर बने इस चबूतरे में अलग-अलग आकार और भारी वजन वाले पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है। कई पत्थर इतने विशाल हैं कि उन्हें आज भी बिना साधन के एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाना संभव नहीं है, ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर उस दौर में इन पत्थरों को यहां तक कैसे पहुंचाया गया होगा और किस तकनीक से एक-दूसरे के ऊपर व्यवस्थित किया गया होगा। खास बात यह है कि गांव के बुजुर्गों के पास भी इसके निर्माण और उपयोग को लेकर कोई ठोस जानकारी नहीं है। बुजुर्गों के अनुसार यह संरचना सौ वर्ष से अधिक पुरानी है। इसकी बनावट और गांव के एक छोर पर इसकी स्थिति से अनुमान लगाया जा सकता है कि अतीत में इसका इस्तेमाल किसी विशेष उद्देश्य के लिए किया जाता रहा होगा, फिलहाल यह स्थान गांव के युवाओं के लिए खेलने और सेल्फी तक सीमित है।
ग्रामीण सोबेन्द्र सिंह रावत के अनुसार, यह संरचना पूर्वजों की मेहनत, पारंपरिक ज्ञान और निर्माण कौशल की निशानी है। ग्रामीणों का कहना है कि समय के साथ ऐसी कई पुरानी संरचनाएं उपेक्षा के कारण खत्म हो रही हैं। यदि विशेषज्ञों से इसका इतिहास, निर्माण तकनीक और संभावित उपयोग दर्ज कराया जाए, तो सुनारा की यह संरचना क्षेत्र की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहर के रूप में सामने आ सकती है।
