महाराष्ट्र का सत्ता बंटवारा और लोकतंत्र
आखरीआंख
सत्ता की महत्वाकांक्षाओं के उफान के बीच मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ी भाजपा-शिवसेना के बीच रार थमती नजर नहीं आ रही है। यह शिवसेना की राजनीतिक महत्वाकांक्षा का ही परिणाम है कि विधानसभा चुनाव के नतीजे आये एक सप्ताह होने पर भी सरकार के गठन पर सहमति नहीं बन पायी। सबसे पुरानी सहयोगी पार्टी बिखरे जनादेश के बीच ऐसे तल्ख तेवर दिखाएगी, ये उमीद भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को भी नहीं थी। शिवसेना न केवल सत्ता में फिटी-फिटी की मांग कर रही है, बल्कि अपने मुखपत्र सामना के जरिये भाजपा पर तीखे हमले भी कर रही है। गठबंधन की नैतिकता के इतर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ जाने के विकल्प तक से डरा रही है। दरअसल, शिवसेना और भाजपा का जनाधार एक जैसा ही है। शिवसेना को चिंता सता रही है कि कहीं भाजपा उसके वोट बैंक को न निगल ले। उसे लगता है कि वह भाजपा के खिलाफ जितना मुखर होगी, उसका जनाधार उतना ही बढ़ेगा। शिवसेना को अहसास है कि भाजपा वर्ष 2014 के मुकाबले कमजोर हुई है। सीटें तो शिवसेना की भी कम हुई हैं, मगर भाजपा का नुकसान यादा है। बिखरे जनादेश के बीच भाजपा इस स्थिति में नहीं है कि निर्दलीयों के सहारे स्थिर सरकार बना सके। दरअसल, वर्ष 2014 में अलग-अलग चुनाव लड़कर दोनों दल राय में मिलकर सरकार बनाने को मजबूर हुए थे। शिवसेना की दलील है कि पिछली सरकार में उसे पर्याप्त हक नहीं मिल पाया। वैसे शिवसेना ने ठाकरे परिवार से पहली बार आदित्य ठाकरे को चुनाव में उतारकर अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा जाहिर कर दी थी, जिसका आकलन भाजपा नहीं कर पायी। हालांकि, राजनीतिक पंडित कयास लगा रहे हैं कि अभी सरकार गठन के लिए कुछ समय बाकी है। अंतिम समय तक कोई फैसला दोनों दलों में हो भी सकता है।
फिलहाल महाराष्ट्र में बारी-बारी से मुयमंत्री बनाने के फार्मूले को लेकर भाजपा व शिवसेना में खींचतान जारी है। वहीं जनादेश की आकांक्षाओं पर?खरा उतरने का दबाव दोनों ही पक्षों पर होगा। यूं तो गठबंधन सरकार के गठन को लेकर?ऐसी खींचतान जारी रहना स्वाभाविक है, मगर महाराष्ट्र में यह स्थिति लंबी खिंच गई है। अब यह कटुता का सबब भी बन रही है, जो निश्चित रूप से दोनों दलों के दीर्घकालिक रिश्तों को प्रभावित करेगी। वैसे दोनों दलों में नूराकुश्ती का इतिहास पुराना है। मोदी सरकार के पिछले कार्यकाल में भी शिवसेना विपक्ष की तरह ही कई मुद्दों पर मुखर विरोधी रही है। लेकिन फिर गठबंधन करके चुनाव मैदान में भी उतरी है। एक समय राजनीति में अलग-थलग माने जाने वाले ये दल राजनीतिक विचारधारा में साय के चलते ही न-न करते भी, हां-हां करते रहे हैं। विचारधारा की प्रकृति उन्हें करीब लाती रही है। फर्क इतना है कि पहले महाराष्ट्र में शिवसेना बड़े भाई की भूमिका में रहती थी, मगर मोदी और फडणवीस के राजनीतिक कौशल ने शिवसेना को छोटे भाई की भूमिका में ला खड़ा किया, जिसे शिवसेना पचा नहीं पा रही है। वैसे भी शिवसेना के मौजूदा नेतृत्व में बाला साहेब ठाकरे जैसा दमखम और नेतृत्व क्षमता नजर नहीं आती। यही वजह है कि राजनीतिक मजबूरी दोनों को अंतर्विरोधों के बावजूद करीब आने को बाध्य कर देती है। मिलकर चुनाव लडऩे के बावजूद शिवसेना धमकाने के अंदाज में भाजपा पर दबाव बना रही है। नि:संदेह सत्ता सुख के लिए राजनीतिक दल किसी भी सीमा तक जाने को आतुर रहते हैं। यह जानते हुए भी कि दो दलों द्वारा बारी-बारी से मुयमंत्री पद हासिल करने का फार्मूला विगत में कामयाब नहीं रहा है, शिवसेना अपनी जिद पर अड़ी है जो कालांतर दलों में अविश्वास का ही वाहक बनता है। प्रशासनिक दृष्टि से भी यह बेहद अव्यावहारिक है। कहीं न कहीं यह जनादेश का उपहास भी है। ऐसे में उमीद की जानी चाहिए कि लोकतांत्रिक परंपराओं का समान करते हुए सरकार बनाने की राह के गतिरोध दूर किये जायेंगे।
