लड़कियों को कानून ही नहीं, अवसरों की भी जरूरत
लोग कहते हैं कानून के हाथ लंबे होते हैं। मगर देखने में मिलता है कि कई मामलों में ये हाथ सिकुड़ कर रह जाते हैं। विवाह के मामले में भी कुछ ऐसा ही होता है। विश्वास न हो तो आजमगढ़, बलिया, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी जैसे किसी भी कस्बाई नगर में चले जाइये। वहां किसी भी सडक़ पर 15-20 मिनट खड़े हो जाइए। सडक़ पर आती-जाती माथे पर सिंदूर लगाए किशोरियों को देखिए और गिन लीजिए उनकी संख्या। आपको पता चल जाएगा 18 वर्ष से कम उम्र की कितनी लड़कियां शादीशुदा हैं और लड़कियों की शादी के लिए तय उम्र की जमीनी हकीकत क्या है। सडक़ों पर आपको प्राइमरी डेटा मिल जाएगा।
अब जरा सेकंडरी डेटा पर गौर फरमाइये। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (2015-16) के अनुसार 56 प्रतिशत लड़कियों की शादी 21 वर्ष से कम उम्र में हो जाती है। गरीब आबादी के बीच यह संख्या 75 प्रतिशत के आसपास है। मतलब लड़कियों की शादी के मामले में अब तक के सारे कानूनों की पकड़ ढीली साबित हुई है। मतलब कानून बने तो कानून का पालन भी सख्ती से होना चाहिए।
लड़कियों की शादी कम उम्र में हो रही है। हमारी सरकार इसके दुष्प्रभावों से चिंतित थी। स्थिति में सुधार के लिए सरकार लगभग डेढ़ साल से हाथ-पैर चला रही थी। और अब एक नया कानून बनने जा रहा है। अब 21 वर्ष से कम उम्र में लड़कियों की शादी कानूनन जुर्म होगा। इसकी जरूरत बताते हुए वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद में कहा कि लड़कियों की शादी की उम्र बढ़ाने का मुख्य उद्देश्य मातृ मृत्युदर में कमी, उनकी सेहत की रक्षा करना और उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए उन्हें बढ़ावा देना है। मगर सोचने की जरूरत है कि क्या वाकई यह कानून से जुड़ा ‘पुलिसिया मामला’ है या इसके तार कहीं और से जुड़े हैं।
जहां तक मातृ मृत्यु दर का प्रश्न है तो यह सच है कि अधिकतर लड़कियां कम उम्र में मां बनकर प्रसव के दौरान होने वाली कांप्लिकेशंस से मर जाती हैं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि वे सब जागरूकता के अभाव और अशिक्षा के चलते समय से पहले बनी मांएं थीं। इनमें अधिकतर महिलाएं मेडिकल सुविधाओं, बेहतर चिकित्सकों के अभाव, अस्पतालों में होने वाली लापरवाही की भी शिकार होकर अपनी जान से हाथ धो देती हैं।
कच्ची उम्र में मां बनने की इतनी बड़ी संख्या होने की एक और बड़ी वजह यह कि हमारे समाज में कोई भी स्त्री मां बनने से पहले यह नहीं सोचती कि उसका शरीर मां बनने के योग्य है या नहीं। अधिकतर औरतें खुद से कभी यह सवाल नहीं पूछती कि क्या वे वास्तव में मां बनने के लिए तैयार हैं या नहीं। वह समाज के दबाव, परिवार की इच्छा और परंपरा का निर्वाह करने के लिए मां बनती हैं।
जहां तक जच्चा-बच्चा की सेहत का मसला है तो यह सीधे उनके पारिवारिक बैकग्राउंड और उनकी आर्थिक स्थिति से जुड़ा हुआ है। गरीब परिवार में जन्मे बच्चे कुपोषण व अन्य बीमारियों की चपेट में जल्दी आ जाते हैं। जबकि संपन्न परिवार में जन्मे बच्चे चाहे वह लडक़ी हो या लडक़ा, अच्छे खान-पान व पोषण के कारण स्वस्थ रहते हैं। गरीब परिवार की आर्थिक स्थिति को भी सुधारने का प्रयास करना होगा। समय के साथ एक नई समस्या भी उभरी है। यह समस्या है कम उम्र में ही विपरीत सेक्स के प्रति यौन आकर्षण का उभरना।
अब लड़कियों की शादी की उम्र तीन साल बढ़ा देने से तो ‘यौन अपराधियों’ की संख्या तो निश्चित तौर पर बढ़ेगी। तो क्या हम पुलिसिया अंदाज में उनकी हरकतों को अपराध मानकर सजा देंगे या किशोरवय बच्चों को पहले से जागरूक किया जाएगा। लड़कियों के पीछे रह जाने की और भी कई वजह हैं। जैसे मां-बाप पहले लड़कियों का ब्याह कर अपने सिर का बोझ हल्का करना चाहते हैं।
दरअसल, मूल समस्या सही शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं और रोजगार के अवसरों की कमी रही है। यदि बारहवीं के बाद लड़कियों को आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाने के लिए प्रशिक्षण दिया जाए तो शायद मां-बाप सहर्ष उसे स्वीकार कर उनकी शादी टाल सकते हैं। और फिर कमाने वाली महिला अपने विवाह से जुड़े फैसले खुद ले सकेगी।
