अब होगा महंगाई का विकास
भारत में विकास अदृश्य सा हो गया है। पिछले कई बरसों से इसकी तलाश चल रही है। लेकिन हर गुजरते साल के साथ विकास नजरों से दूर होता जा रहा है। नोटबंदी की वजह से सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी की विकास दर गिर कर चार फीसदी तक आ गई थी और उसके बाद कोरोना के पहले साल में यह माइनस 6.7 फीसदी रही। कोरोना के दूसरे साल में विकास दर सकारात्मक हुई लेकिन माइनस 6.7 फीसदी के ऊपर सिर्फ डेढ़ फीसदी की बढ़ोतरी हुई। कमजोर आधार के ऊपर चालू वित्त वर्ष में नौ फीसदी से ज्यादा विकास दर की उम्मीद की जा रही थी लेकिन वित्त वर्ष के आखिर में आई ओमिक्रॉन की लहर और यूक्रेन पर रूस के हमले ने सारी उम्मीदों को धुंधला कर दिया। युद्ध की वजह से कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से महंगाई का नया खतरा देश के सामने खड़ा हो गया है। सरकार की ओर से जारी पिछले दो महीनों यानी जनवरी और फरवरी के आंकड़ों में खुदरा महंगाई रिजर्व बैंक की ओर से तय की गई अधिकतम सीमा से ऊपर थी।
भारतीय रिजर्व बैंक ने खुदरा मुद्रास्फीति का कंफर्ट जोन चार फीसदी का बनाया है और इसमें दो फीसदी प्लस-माइनस की गुंजाइश रखी है। इस लिहाज से अधिकतम सीमा छह फीसदी है। लेकिन जनवरी और फरवरी दोनों महीनों में खुदरा मुद्रास्फीति छह फीसदी से ज्यादा रही और थोक मुद्रास्फीति लगातार 11 महीने से दहाई में है। यूक्रेन पर रूस के हमले और ओपेक देशों के उत्पादन नहीं बढ़ाने के फैसले का साझा असर यह है कि अभी कच्चे तेल की कीमत एक सौ डॉलर प्रति बैरल है और एक अनुमान के मुताबिक यह 125 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जाएगी। ध्यान रहे भारत अपनी जरूरत का लगभग 84 फीसदी तेल आयात करता है। ऐसे में भारत के लिए मुद्रास्फीति दर छह फीसदी से नीचे रखना नामुमकिन है। पिछले चार महीने से चुनावों की वजह से भारत में तेल की खुदरा कीमतें स्थिर थीं, लेकिन अब उनमें बढ़ोतरी शुरू हो गई है। पेट्रोल, डीजल, सीएनजी, पीएनजी और रसोई गैस की कीमतों में एक साथ बढ़ोतरी हुई है।
पेट्रोलियम उत्पादों की खुदरा कीमतों में बढ़ोतरी से पहले सरकार ने थोक कीमत में एक साथ 25 रुपए प्रति लीटर की बढ़ोतरी की। ऐसा प्रचारित किया गया कि थोक कीमत में बढ़ोतरी का असर आम लोगों पर नहीं होगा। लेकिन यह झूठा प्रचार है। थोक कीमतों में बढ़ोतरी ज्यादा बड़ी आबादी को प्रभावित करेगी। रेलवे और सडक़ परिवहन से यात्रा किराया भी बढ़ेगा और माल ढुलाई भी महंगी होगी, जिससे उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें प्रभावित होंगी। इसी तरह फैक्टरियों में उत्पादन का व्यय बढ़ेगा और कृषि कार्य भी महंगा होगा, जिससे हर तरह के उत्पाद की कीमत बढ़ेगी। थोक कीमतों में बढ़ोतरी के बाद खुदरा कीमतों में भी रोजाना बढ़ोतरी होने लगी है और घरेलू व कॉमर्शियल रसोई गैस के दाम भी बढ़ गए हैं।
कोरोना महामारी का असर कम होने के बाद थोड़े दिन पहले ही विकास दर में थोड़ी तेजी लौटनी शुरू हुई है। एक बार फिर इस पर ब्रेक लग सकता है। महंगाई बढऩे से उपभोक्ता मांग में स्वाभाविक रूप से कमी आएगी। कोरोना काल में वैसे भी आम नागरिकों ने खर्च काफी कम कर दिए हैं। महामारी के दौरान स्वास्थ्य जरूरतों ने भी लोगों को बाध्य किया कि वे खर्च घटाएं। अब अगर महंगाई काबू में नहीं रहती है और कीमतों में इजाफा होता है तो लोगों का खर्च और घटेगा। ध्यान रहे भारत की अर्थव्यवस्था बुनियादी रूप से आम उपभोक्ताओं की खरीद के आधार पर चलती है। देश की जीडीपी में 56 फीसदी हिस्सा उपभोक्ता खर्च का है। यानी लोग कपड़े, फ्रीज, एसी, गाडिय़ां, फोन आदि खरीदते हैं या छुट्टियां मनाने निकलते हैं, यात्रा करते हैं तो उस पर होने वाले खर्च से विकास दर बढ़ती है। देश में अब भी लोग इन चीजों पर इतना खर्च नहीं कर रहे हैं कि विकास दर को पंख लगे लेकिन अगर महंगाई काबू में नहीं आई तो खर्च और कम होगा, जिससे विकास दर थमेगी।
चालू वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही यानी अक्टूबर से दिसंबर 2021 में विकास दर सिर्फ 5.4 फीसदी रही। सोचें, त्योहारों के सीजन में विकास दर का साढ़े पांच फीसदी से कम होना किस बात का संकेत है! इसके बाद ओमिक्रॉन की लहर भी आई और युद्ध भी छिड़ गया। तभी आखिरी तिमाही में विकास दर और कम होने का अंदेशा है। इसे देखते हुए अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी मूडी ने चालू वित्त वर्ष के लिए विकास दर का अनुमान 9.5 से घटा कर 9.1 फीसदी कर दिया है। नौ फीसदी की ऊंची विकास दर भी इसलिए दिख रही है क्योंकि पिछले वित्त वर्ष की विकास दर का आधार बहुत मामूली है। अगले वित्त वर्ष यानी 2022-23 में साढ़े पांच फीसदी से कम विकास दर का अनुमान लगाया जा रहा है। एक तरफ अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियां विकास दर का अनुमान घटा रही हैं तो दूसरी ओर महंगाई दर का अनुमान बढ़ा रही हैं। चालू वित्त वर्ष में खुदरा मुद्रास्फीति औसतन छह फीसदी से ऊपर रहने का अनुमान है।
इसी वजह से माना जा रहा है कि भारत ‘स्टैगफ्लेशन’ की स्थिति में पहुंच गया है। हालांकि भारत सरकार इससे इनकार कर रही है। ब्रिटेन के एक कंजरवेटिव सांसद इयन मैकलॉयड ने सबसे पहले इस जुमले का इस्तेमाल किया था। इसका मतलब होता है कि विकास दर का स्टैगनेंट होना यानी ठहर जाना और महंगाई यानी इन्फ्लेशन का बढ़ते जाना। यह बहुत खतरनाक स्थिति होती है। क्योंकि आमतौर पर महंगाई तब बढ़ती है, जब अर्थव्यवस्था तेजी से विकास कर रही होती है। जैसे यूपीए सरकार के समय औसत विकास दर आठ फीसदी के आसपास थी। अर्थव्यवस्था छलांग मार रही थी। हर सेक्टर में मांग बढ़ रही थी। लोग उत्पादों और सेवाओं पर खर्च कर रहे थे। ऐसे समय में अगर महंगाई बढ़े तो वह आम लोगों को चुभती नहीं है। लेकिन इस समय हालात बिल्कुल उलट हैं। इस समय बाजार में ज्यादातर उत्पादों और सेवाओं की मांग नहीं है। लोग जीवन चलाने के लिए जरूरी चीजों की ही खरीद कर रहे हैं।
इसके बावजूद खाद्य वस्तुओं से लेकर हर चीज की कीमत में इजाफा हो रहा है। ऐसे समय में जरूरी है लोगों के हाथ में नकदी पहुंचे और लोग खर्च करें, जिससे बाजार में मांग बढ़े। पर बढ़ती महंगाई के बीच इसकी संभावना कम दिख रही है। यह स्थिति केंद्रीय बैंक के लिए भी बहुत संकट वाली है। उसे महंगाई और विकास दोनों की चिंता करनी है। अगर विकास दर बढ़ाने के लिए नीतिगत ब्याज दरों में कमी की जाती है तो महंगाई बढ़ेगी और अगर महंगाई काबू में रखने के लिए ब्याज दर बढ़ाए जाते हैं तो विकास दर और गिरेगी। इस दुष्चक्र से निकलने का तरीका सरकार निकाल सकती है अगर वह लोगों के हाथ में पैसे पहुंचाए। पैसे पहुंचाने का एक तरीका यह है कि उत्पाद शुल्क में कमी करके तेल की खुदरा कीमतों को बढऩे से रोका जाए। दूसरा तरीका सरकारी खर्च बढ़ाने और रोजगार पैदा करने का है।
