March 4, 2026

उत्तराखंड पंचायती चुनाव 2025: गरुड के मनाखेत गांव में 100 से अधिक मतदाता वोट देने से वंचित, मौलिक अधिकारों पर बड़ा सवाल

बागेश्वर/गरुड़ । उत्तराखंड पंचायती चुनाव 2025 में एक ओर जहां लोकतंत्र का उत्सव पूरे राज्य में धूमधाम से मनाया गया, वहीं दूसरी ओर बागेश्वर जिले के गरुड़ विकासखंड अंतर्गत ग्राम सभा मनाखेत से चौंकाने वाली और चिंताजनक खबर सामने आई है। यहां 100 से अधिक मतदाता मतदाता सूची में नाम न होने के चलते वोट देने के अधिकार से वंचित रह गए।

स्थानीय लोगों के अनुसार, इन मतदाताओं ने समय रहते अपने नाम सूची में दर्ज करवाने के लिए सभी आवश्यक दस्तावेज और प्रक्रियाएं पूरी की थीं, बावजूद इसके उनका नाम अंतिम सूची में शामिल नहीं किया गया। चुनाव के दिन जब वे बूथ पर पहुंचे, तो उन्हें यह कहकर लौटा दिया गया कि “आपका नाम मतदाता सूची में नहीं है।”

कौन है जिम्मेदार? सरकार या निर्वाचन आयोग?

यह स्थिति केवल मनाखेत गांव तक सीमित नहीं है। बागेश्वर जिले के कई अन्य क्षेत्रों से भी नाम कटने और अपडेट न होने की शिकायतें सामने आई हैं। इससे यह सवाल उठता है कि जब आम नागरिक ने अपनी जिम्मेदारी निभाई, तो क्या सरकार और निर्वाचन आयोग ने अपनी ज़िम्मेदारी निभाई?

क्या मतदाता सूची के अंतिम प्रकाशन से पहले उचित जांच-पड़ताल नहीं की गई?

नाम हटने या न जुड़ने के पीछे तकनीकी खामियां थीं या लापरवाही?

और अगर यह लापरवाही थी, तो इसके लिए कौन जिम्मेदार होगा?

मौलिक अधिकारों का हनन

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 326 प्रत्येक नागरिक को चुनाव में भाग लेने और अपने प्रतिनिधि चुनने का अधिकार देता है। ऐसे में इन मतदाताओं को वोट न देने देना सीधा-सीधा उनके मौलिक अधिकार का हनन है।
“हमने हर बार वोट दिया है, इस बार भी फार्म भरा था, लेकिन न जाने क्यों हमारा नाम सूची से हटा दिया गया,”—यह कहना है मनाखेत निवासी 68 वर्षीय कमला देवी का, जो 40 वर्षों से हर चुनाव में मतदान करती रही हैं।

लोकतंत्र पर खतरा?

चुनाव लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव होता है। यदि नागरिकों को ही इससे वंचित किया जाने लगे, तो यह न केवल लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करता है बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

जांच और कार्रवाई की मांग

अब जब ये शिकायतें सामने आ चुकी हैं, तो ज़रूरी है कि प्रशासन और निर्वाचन आयोग इस मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करे। साथ ही आगामी चुनावों में ऐसी घटनाएं न दोहराई जाएं, इसके लिए सिस्टम में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाना अनिवार्य है।