पलायन की उदासी से आत्मनिर्भरता की नई पहचान तक: द्वारढका बना ‘देवकुंज बाखली’, युवाओं की पहल से गांव में लौटी नई उम्मीद
गरुड़ (बागेश्वर) । कभी पलायन और कम आबादी के कारण ‘द्वारढका’ के नाम से पहचाने जाने वाला जिजोली गांव का एक तोक अब नई पहचान के साथ आगे बढ़ेगा। गांव के युवाओं ने बदलते समय, सकारात्मक सोच और रिवर्स पलायन की भावना को नई दिशा देते हुए द्वारढका का नाम बदलकर ‘देवकुंज बाखली’ रख दिया है। सोमवार को ग्रामीणों, जनप्रतिनिधियों और क्षेत्र के गणमान्य लोगों की उपस्थिति में पूजा-पाठ के साथ नाम परिवर्तन का कार्यक्रम विधिवत संपन्न हुआ। इस अवसर पर बड़ी संख्या में ग्रामीण मौजूद रहे और सभी ने नई पहचान के साथ गांव के उज्ज्वल भविष्य की कामना की।
नाम परिवर्तन की यह पहल केवल एक स्थान का नाम बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे गांव की बदलती परिस्थितियों, युवाओं के आत्मविश्वास और अपने पुश्तैनी गांव में लौटकर स्वरोजगार अपनाने की प्रेरक कहानी भी जुड़ी है।
नकारात्मक पहचान को पीछे छोड़ सकारात्मक भविष्य की ओर कदम
गरुड़ विकासखंड के जिजोली गांव के अंतर्गत आने वाले द्वारढका तोक में वर्तमान में लगभग 10 परिवार निवास करते हैं। एक समय ऐसा था, जब रोजगार और बेहतर आजीविका की तलाश में ग्रामीणों को अपना घर-गांव छोड़कर दिल्ली, मुंबई सहित देश के विभिन्न महानगरों की ओर रुख करना पड़ा। धीरे-धीरे गांव की आबादी कम होती गई और पलायन के कारण क्षेत्र की रौनक भी प्रभावित हुई।
द्वारढका नाम को सामान्य अर्थों में ‘दरवाजा बंद’ होने से जोड़कर देखा जाता रहा है। ग्रामीणों के अनुसार, यह नाम गांव में कभी रही कम आबादी और पलायन की परिस्थितियों की याद दिलाता था। ऐसे में नई पीढ़ी ने महसूस किया कि बदलते समय और परिस्थितियों के साथ गांव की पहचान भी सकारात्मक होनी चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियों को एक नई सोच और नई उम्मीद के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा मिल सके।
इसी विचार के साथ युवाओं ने गांव के नाम में बदलाव की मुहिम शुरू की। ग्रामीणों ने भी इस पहल का समर्थन किया और आपसी विचार-विमर्श के बाद एक नई पहचान देने का निर्णय लिया।
लॉकडाउन के बाद युवाओं ने अपनाया रिवर्स पलायन
इस बदलाव के पीछे रिवर्स पलायन की एक महत्वपूर्ण कहानी भी है। रोजगार की तलाश में महानगरों की ओर गए कई युवाओं ने लॉकडाउन के बाद अपने गांव लौटने का निर्णय लिया। गांव लौटने के बाद इन युवाओं ने स्थानीय स्तर पर स्वरोजगार के अवसर तलाशे और अपने क्षेत्र में रहकर ही आजीविका चलाने की दिशा में कदम बढ़ाए।
युवाओं की इस पहल ने ग्रामीण जीवन के प्रति विश्वास को मजबूत किया है। अब वे अपने परिवारों का भरण-पोषण करते हुए गांव में ही रोजगार की संभावनाएं तलाश रहे हैं। इससे यह संदेश भी उभरकर सामने आया है कि यदि स्थानीय संसाधनों का बेहतर उपयोग किया जाए और युवाओं को स्वरोजगार के अवसर मिलें, तो पहाड़ों से पलायन की चुनौती को कम करने की दिशा में सार्थक प्रयास किए जा सकते हैं।
ग्रामीणों का मानना है कि गांव की नई पहचान इस सकारात्मक बदलाव को और मजबूती देगी। ‘देवकुंज बाखली’ नाम के साथ वे अपने गांव की सांस्कृतिक विरासत, सामाजिक एकता और भविष्य की उम्मीदों को जोड़कर देख रहे हैं।
स्वामी शंकरानन्द गिरी के सुझाव पर चुना गया नाम
ग्रामीण गोविंद जोशी ने बताया कि द्वारढका नाम नकारात्मकता और उदासी का संदेश देता था। बदलते समय और परिस्थितियों के अनुरूप गांव की पहचान में बदलाव की आवश्यकता महसूस की गई। इसके बाद युवाओं ने नाम परिवर्तन का विचार सामने रखा, जिसे ग्रामीणों का समर्थन मिला।
उन्होंने बताया कि श्यामखेत आश्रम के स्वामी शंकरानन्द गिरी महाराज ने ग्रामीणों को ‘देवकुंज बाखली’ नाम रखने का सुझाव दिया। यह नाम ग्रामीणों को पसंद आया और सर्वसम्मति से इसे स्वीकार कर लिया गया। इसके बाद द्वारढका तोक को नई पहचान देने के उद्देश्य से नाम परिवर्तन कार्यक्रम आयोजित किया गया।
पूजा-पाठ के साथ संपन्न हुआ नाम परिवर्तन कार्यक्रम
सोमवार को आयोजित कार्यक्रम में विधिवत पूजा-पाठ किया गया। पंडित चन्द्रशेखर कांडपाल ने धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराए। इस दौरान ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों ने नई पहचान के साथ गांव की सुख-समृद्धि, खुशहाली और निरंतर प्रगति की कामना की।
कार्यक्रम में उत्तराखंड उच्च न्यायालय के अधिवक्ता डीके जोशी, जिजोली की ग्राम प्रधान कलावती देवी, क्षेत्र पंचायत सदस्य ऋतुराज जोशी, भवानी देवी जोशी, दिनेश भट्ट, प्रकाश भट्ट, दीप भट्ट, दुर्गा देवी, भोला दत्त पांडे, आनंद सिंह दोसाद सहित अनेक ग्रामीण और गणमान्य लोग मौजूद रहे।
नाम परिवर्तन के साथ गांव को नई दिशा देने का संकल्प
‘देवकुंज बाखली’ नाम अपनाने के साथ ग्रामीणों ने अपने गांव की सकारात्मक पहचान को आगे बढ़ाने का संदेश दिया है। यह पहल बताती है कि पहाड़ों में बदलाव की शुरुआत केवल बड़े सरकारी प्रयासों से ही नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों की सामूहिक सोच और युवाओं की इच्छाशक्ति से भी हो सकती है।
एक ओर जहां पहाड़ के अनेक गांव पलायन की चुनौती से जूझ रहे हैं, वहीं जिजोली गांव के इस तोक में युवाओं का लौटना और स्थानीय स्तर पर स्वरोजगार अपनाना उम्मीद जगाता है। ग्रामीणों की यह पहल अपनी जड़ों से जुड़ने, गांव के प्रति जिम्मेदारी निभाने और आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहतर भविष्य तैयार करने की भावना को भी दर्शाती है।
द्वारढका से देवकुंज बाखली तक का यह सफर केवल नाम बदलने की कहानी नहीं, बल्कि पलायन की पीड़ा से उबरकर आत्मनिर्भरता, सकारात्मक सोच और नई उम्मीदों की ओर बढ़ते एक गांव की प्रेरक पहल है।
