गरुड़ में वन पंचायतों की क्षेत्रीय परामर्शदात्री समिति का गठन, मनोज रावल बने ब्लॉक अध्यक्ष
11 सदस्यीय समिति का हुआ चयन, वन पंचायतों की वर्षों से लंबित मांगों को लेकर जगी नई उम्मीद; वन पंचायत विकास समिति के जिलाध्यक्ष अर्जुन राणा ने दी बधाई
गरुड़, बागेश्वर। वन पंचायतों को अधिक अधिकार संपन्न बनाने, उनके विकास को गति देने और वर्षों से लंबित समस्याओं के समाधान की दिशा में गरुड़ विकासखंड में एक महत्वपूर्ण पहल हुई है। तहसील सभागार गरुड़ में वन पंचायतों की क्षेत्रीय परामर्शदात्री समिति के गठन के लिए आयोजित बैठक में दर्जनों वन पंचायतों के सरपंचों की उपस्थिति में 11 सदस्यीय समिति का चयन किया गया। इसके बाद समिति के सदस्यों ने सर्वसम्मति से मनोज रावल को क्षेत्रीय अध्यक्ष यानी ब्लॉक अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी। उनके अध्यक्ष चुने जाने से क्षेत्र की वन पंचायतों को अपनी समस्याओं और मांगों को एकजुट होकर शासन-प्रशासन के समक्ष उठाने के लिए एक मजबूत मंच मिलने की उम्मीद जगी है।
एसडीएम की अध्यक्षता में हुई बैठक, विभिन्न विभागों के अधिकारी रहे मौजूद
क्षेत्रीय परामर्शदात्री समिति के गठन को लेकर आयोजित बैठक की अध्यक्षता उपजिलाधिकारी गरुड़ वैभव कांडपाल ने की। बैठक में राज्य सरकार के निर्देशों के अनुरूप ब्लॉक से लेकर जिला एवं प्रदेश स्तर तक वन पंचायतों की क्षेत्रीय परामर्शदात्री समितियों के गठन की आवश्यकता पर चर्चा की गई।
बैठक में वन पंचायत निरीक्षक मेहता, वन विभाग से उप वन क्षेत्राधिकारी ईश्वरी दत्त कांडपाल, बैजनाथ के उप वन क्षेत्राधिकारी तथा गड़खेत के उप वन क्षेत्राधिकारी हरीश चंद्र पांडे व रमेश सतवाल सहित विभिन्न विभागों के अधिकारियों ने प्रतिभाग किया। राजस्व विभाग की ओर से उपजिलाधिकारी एवं तहसीलदार भी उपस्थित रहे।
बैठक में वन पंचायतों के सरपंचों ने प्रतिभाग किया और समिति के गठन की प्रक्रिया पूरी की गई। इसके तहत 11 सदस्यों का चयन किया गया। तत्पश्चात सभी चयनित सदस्यों ने आपसी सहमति से मनोज रावल को क्षेत्रीय अध्यक्ष चुना।
वन पंचायतों को अधिकार और संसाधन दिलाना होगी बड़ी चुनौती
उत्तराखंड में वन पंचायतें ग्रामीण जीवन, स्थानीय वन संरक्षण, पर्यावरण संतुलन और ग्रामीणों की आजीविका से जुड़ी महत्वपूर्ण संस्थाएं हैं। गांवों के आसपास के वनों के संरक्षण और संवर्धन में वन पंचायतों की भूमिका अहम है। इसके बावजूद प्रदेश की अनेक वन पंचायतें लंबे समय से सीमित संसाधनों, पर्याप्त बजट के अभाव और अधिकारों से जुड़ी समस्याओं का सामना करती आ रही हैं।
ऐसे में क्षेत्रीय परामर्शदात्री समिति के गठन को वन पंचायतों की समस्याओं को संगठित रूप से उठाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। अब नवनिर्वाचित अध्यक्ष और समिति के सदस्यों के सामने सबसे बड़ी चुनौती वन पंचायतों की जमीनी समस्याओं को प्राथमिकता के आधार पर संकलित कर उन्हें शासन-प्रशासन तक पहुंचाना और उनके समाधान के लिए प्रभावी पैरवी करना होगा।
छोटे भूभाग वाली वन पंचायतों को रिजर्व फॉरेस्ट से भूमि आवंटित करने की मांग प्रमुख
वन पंचायत विकास समिति के जिलाध्यक्ष एवं पत्रकार अर्जुन राणा ने मनोज रावल के क्षेत्रीय अध्यक्ष चुने जाने पर उन्हें बधाई देते हुए उम्मीद जताई कि उनके नेतृत्व में वन पंचायतों की वर्षों से लंबित मांगों को मजबूती से उठाया जाएगा।
अर्जुन राणा ने कहा कि वन पंचायतों के समक्ष कई ऐसी समस्याएं हैं, जिनका समाधान लंबे समय से अपेक्षित है। इनमें विशेष रूप से कम भूभाग वाली वन पंचायतों को उनकी जरूरतों के अनुरूप रिजर्व फॉरेस्ट से भूमि आवंटित किए जाने की मांग महत्वपूर्ण है। जिन वन पंचायतों के पास वन क्षेत्र सीमित है, उन्हें पर्याप्त भूमि एवं संसाधन उपलब्ध कराने की दिशा में गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए, ताकि वे वन संरक्षण और ग्रामीण आवश्यकताओं से संबंधित अपनी जिम्मेदारियों का बेहतर ढंग से निर्वहन कर सकें।
उन्होंने कहा कि वन पंचायतों के सरपंचों को अधिक अधिकार संपन्न बनाया जाना भी समय की आवश्यकता है। जब सरपंचों पर वन संरक्षण और प्रबंधन की जिम्मेदारी है, तो उन्हें निर्णय लेने की प्रक्रिया में पर्याप्त अधिकार और आवश्यक सहयोग भी मिलना चाहिए।
ग्राम पंचायतों के हस्तक्षेप से मुक्त हों वन पंचायतें, मिले स्वतंत्र कार्यक्षेत्र
अर्जुन राणा ने वन पंचायतों के कामकाज में ग्राम पंचायतों के हस्तक्षेप को लेकर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि वन पंचायतों को उनकी निर्धारित जिम्मेदारियों के अनुरूप स्वतंत्र रूप से कार्य करने का अवसर मिलना चाहिए तथा ग्राम पंचायतों के अनावश्यक हस्तक्षेप को समाप्त करने की दिशा में ठोस व्यवस्था की जानी चाहिए।
उनका कहना है कि वन पंचायतों की अपनी अलग भूमिका, जिम्मेदारियां और कार्यक्षेत्र हैं। ऐसे में इनके अधिकारों एवं कार्यप्रणाली को स्पष्ट किया जाना आवश्यक है, ताकि सरपंच और वन पंचायत प्रबंधन समिति स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप वन संरक्षण, विकास और संसाधनों के उपयोग से संबंधित कार्य प्रभावी तरीके से कर सकें।
हर वर्ष बजट और कैंपा योजना से अधिक धनराशि देने की मांग
वन पंचायतों के विकास के लिए नियमित वित्तीय संसाधनों की उपलब्धता को भी अर्जुन राणा ने प्रमुख मुद्दा बताया। उन्होंने कहा कि ग्राम पंचायतों की तर्ज पर वन पंचायतों के लिए भी प्रत्येक वर्ष बजट की व्यवस्था की जानी चाहिए, ताकि वन संरक्षण, पौधरोपण, चाल-खाल निर्माण, जल संरक्षण, वनाग्नि की रोकथाम और अन्य आवश्यक कार्यों को योजनाबद्ध तरीके से पूरा किया जा सके।
इसके अतिरिक्त उन्होंने कैंपा (CAMPA) योजना के तहत वन पंचायतों को नियमित रूप से अधिक बजट उपलब्ध कराने की मांग भी उठाई। उनका मानना है कि यदि वन पंचायतों को पर्याप्त वित्तीय सहायता और समय पर धनराशि मिले, तो स्थानीय स्तर पर वन संरक्षण के कार्यों को और अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। इससे ग्रामीणों की भागीदारी बढ़ेगी और वन पंचायतें अपनी जिम्मेदारियों को बेहतर ढंग से निभा सकेंगी।
युवा नेतृत्व से वन पंचायतों की समस्याओं के समाधान की उम्मीद
मनोज रावल के क्षेत्रीय अध्यक्ष चुने जाने पर अर्जुन राणा ने विश्वास जताया कि युवा नेतृत्व वन पंचायतों की समस्याओं को नई ऊर्जा और प्रभावी तरीके से सामने लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। उन्होंने उम्मीद जताई कि नवनिर्वाचित अध्यक्ष सभी सरपंचों को साथ लेकर चलेंगे और वन पंचायतों के हितों से जुड़े मुद्दों पर सामूहिक प्रयास करेंगे।
उन्होंने कहा कि वन पंचायतों की समस्याओं का समाधान केवल स्थानीय स्तर पर प्रयास करने से संभव नहीं होगा, बल्कि इसके लिए शासन, वन विभाग और राजस्व विभाग के साथ निरंतर संवाद एवं समन्वय स्थापित करना भी जरूरी है। क्षेत्रीय परामर्शदात्री समिति इस दिशा में एक महत्वपूर्ण माध्यम बन सकती है।
अब शासन तक पहुंचेगी वन पंचायतों की सामूहिक आवाज?
गरुड़ में क्षेत्रीय परामर्शदात्री समिति का गठन ऐसे समय में हुआ है, जब वन पंचायतें अपने अधिकारों के विस्तार, पर्याप्त बजट और प्रभावी कार्यप्रणाली की मांग कर रही हैं। ऐसे में समिति की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह सरपंचों की समस्याओं को कितनी गंभीरता से उठाती है और उनके समाधान के लिए कितनी प्रभावी पहल करती है।
अब क्षेत्र की वन पंचायतों को नवनिर्वाचित अध्यक्ष मनोज रावल से काफी उम्मीदें हैं। यदि समिति वन पंचायतों की लंबित मांगों को प्राथमिकता के आधार पर शासन तक पहुंचाने और उनके समाधान के लिए लगातार प्रयास करने में सफल रहती है, तो इससे न केवल वन पंचायतों की कार्यक्षमता बढ़ेगी, बल्कि ग्रामीण स्तर पर वन संरक्षण और विकास कार्यों को भी नई दिशा मिल सकती है।
गरुड़ में समिति का गठन वन पंचायतों को संगठित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। अब देखना होगा कि यह नई टीम वर्षों से लंबित मांगों को पूरा कराने के लिए कितनी प्रभावी भूमिका निभाती है।
