वन पंचायत सरपंचों को संवैधानिक दर्जा और मानदेय की मांग तेज, आज हल्द्वानी में होगा विशाल प्रदर्शन
प्रदेश की 11,217 वन पंचायतों को वित्तीय एवं प्रशासनिक अधिकार देने की मांग, सरपंचों के लिए ₹3,500 और पंचों के लिए ₹500 मासिक मानदेय की मांग
बागेश्वर । उत्तराखंड में जंगलों के संरक्षण और स्थानीय स्तर पर वन प्रबंधन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभा रही वन पंचायतों के अधिकारों और सरपंचों के मानदेय का मुद्दा एक बार फिर जोर पकड़ने लगा है। वन पंचायत परामर्शदात्री समिति, कुमाऊं मंडल ने प्रदेश की वन पंचायतों के सरपंचों को संवैधानिक दर्जा देने, सम्मानजनक मानदेय निर्धारित करने तथा वन पंचायतों को पूर्ण वित्तीय एवं प्रशासनिक स्वायत्तता प्रदान करने की मांग को लेकर आंदोलन का ऐलान किया है। समिति के आह्वान पर 22 अगस्त को हल्द्वानी में सुबह 11 बजे से विशाल प्रदर्शन किया जाएगा। प्रदर्शन के बाद जिलाधिकारी कार्यालय से आयुक्त कुमाऊं मंडल कार्यालय तक रैली निकालकर शासन-प्रशासन के समक्ष मांगों को जोरदार ढंग से उठाया जाएगा।
समिति का कहना है कि उत्तराखंड में वन पंचायतों की परंपरा पुरानी है और प्रदेश की 11,217 वन पंचायतें वर्ष 1931 से वन संरक्षण के कार्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। ग्रामीण समुदाय की भागीदारी से संचालित ये संस्थाएं जंगलों की सुरक्षा के साथ-साथ जलस्रोतों, जैव विविधता और स्थानीय पर्यावरण के संरक्षण में भी अहम योगदान देती हैं। इसके बावजूद वन पंचायतों और उनके निर्वाचित सरपंचों को उनकी जिम्मेदारियों के अनुरूप अधिकार एवं आर्थिक संसाधन नहीं मिल पा रहे हैं।
जिम्मेदारी बड़ी, लेकिन मानदेय की व्यवस्था नहीं
वन पंचायत परामर्शदात्री समिति का तर्क है कि वन पंचायतों के सरपंच और पंच लंबे समय से स्थानीय स्तर पर जंगलों की देखरेख, वनाग्नि की रोकथाम और वन संपदा के संरक्षण में भूमिका निभाते आ रहे हैं। इसके बावजूद उन्हें पर्याप्त मानदेय नहीं मिलता। समिति ने प्रत्येक वन पंचायत सरपंच के लिए ₹3,500 प्रतिमाह तथा प्रत्येक पंच के लिए ₹500 प्रतिमाह मानदेय स्वीकृत करने की मांग की है।
यह मांग ऐसे समय में उठाई जा रही है जब प्रदेश में स्थानीय निकायों के निर्वाचित प्रतिनिधियों के मानदेय को लेकर भी लगातार चर्चा होती रही है। उत्तराखंड में ग्राम प्रधानों का मानदेय ₹3,500 प्रतिमाह किए जाने की जानकारी सरकारी कार्यक्रमों में भी दी गई है।
कार्बन क्रेडिट की 30 प्रतिशत राशि वन पंचायतों को देने की मांग
समिति ने वन पंचायतों को कार्बन क्रेडिट से प्राप्त होने वाली राशि में 30 प्रतिशत हिस्सेदारी देने की मांग भी उठाई है। इसके साथ ही एबीएस (Access and Benefit Sharing) के तहत मिलने वाली बेनिफिट/रॉयल्टी राशि का लाभ भी वन पंचायतों को दिए जाने की मांग की गई है।
समिति का कहना है कि जिन क्षेत्रों में स्थानीय समुदाय जंगलों और जैव संसाधनों के संरक्षण में प्रत्यक्ष भूमिका निभाता है, वहां संरक्षण से उत्पन्न आर्थिक लाभ में भी स्थानीय वन पंचायतों की भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए।
वन पंचायतों को पूर्ण वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार देने की मांग
आंदोलनकारियों की प्रमुख मांगों में वन पंचायतों को पूर्ण वित्तीय एवं प्रशासनिक अधिकार देना शामिल है। उनका कहना है कि जब वन पंचायतों को स्थानीय स्तर पर वन संरक्षण की जिम्मेदारी दी गई है तो उन्हें निर्णय लेने और उपलब्ध संसाधनों के उपयोग का पर्याप्त अधिकार भी मिलना चाहिए।
समिति ने समानांतर ग्राम वन समितियों को समाप्त करने की मांग भी की है। उनका तर्क है कि एक ही क्षेत्र में समान प्रकृति की अलग-अलग समितियां होने से अधिकारों और जिम्मेदारियों को लेकर भ्रम की स्थिति पैदा होती है। इसके स्थान पर वन पंचायत व्यवस्था को मजबूत और प्रभावी बनाने की आवश्यकता है।
नियमावली 2012 के नियम 54 में संशोधन की मांग
वन पंचायत परामर्शदात्री समिति ने वन पंचायत नियमावली-2012 के नियम 54 में संशोधन की मांग भी उठाई है। समिति के अनुसार राज्य स्तरीय समिति में जिला समन्वयकों की भूमिका को फिर से सुनिश्चित किया जाना चाहिए, ताकि वन पंचायतों की समस्याएं और सुझाव राज्य स्तर तक प्रभावी ढंग से पहुंच सकें।
गौरतलब है कि उत्तराखंड सरकार की ओर से उत्तराखण्ड पंचायती वन नियमावली-2026 के प्रारूप पर भी हितधारकों से सुझाव और टिप्पणियां आमंत्रित की गई हैं। इसका प्रकाशन 30 जुलाई 2026 को किया गया था और सरकारी वेबसाइट पर इसकी जानकारी उपलब्ध है।
वन पंचायत समितियों में सरपंच को अध्यक्ष बनाने की मांग
समिति ने वन पंचायतों से जुड़ी गठित समितियों में सरपंच को अध्यक्ष बनाए जाने की मांग की है। समिति का कहना है कि वन पंचायत का निर्वाचित सरपंच ही स्थानीय वन पंचायत व्यवस्था का प्रतिनिधि होता है, इसलिए संबंधित समितियों की अध्यक्षता का अधिकार भी उसी के पास होना चाहिए। अध्यक्ष पद ग्राम प्रधान के पास होने की व्यवस्था को बदलने की मांग की गई है।
सभी 11,217 वन पंचायतों को एबीएस का लाभ मिले
समिति ने प्रदेश की सभी 11,217 वन पंचायतों को एबीएस का लाभ दिए जाने की मांग की है। इसके अलावा प्रत्येक वन पंचायत की डिजिटल सीमा निर्धारित करने की मांग भी की गई है। डिजिटल सीमांकन से वन पंचायतों के अधिकार क्षेत्र को स्पष्ट करने, रिकॉर्ड को व्यवस्थित करने और भविष्य में होने वाले विवादों को कम करने में मदद मिलने की उम्मीद जताई गई है।
एक साथ चुनाव और पांच वर्ष का निश्चित कार्यकाल
आंदोलनकारियों ने सभी वन पंचायतों में एक साथ चुनाव कराने तथा निर्वाचित प्रतिनिधियों के लिए पांच वर्ष का निश्चित कार्यकाल निर्धारित करने की मांग भी रखी है। समिति का मानना है कि निश्चित कार्यकाल से वन पंचायतों में स्थायित्व आएगा और सरपंच व पंच दीर्घकालीन योजनाओं के साथ वन संरक्षण के काम को बेहतर ढंग से आगे बढ़ा सकेंगे।
सरकार के सामने अपनी ताकत दिखाएंगे वन पंचायत प्रतिनिधि
22 अगस्त को प्रस्तावित प्रदर्शन को लेकर कुमाऊं के साथ ही गढ़वाल क्षेत्र से भी वन पंचायत प्रतिनिधियों के हल्द्वानी पहुंचने की तैयारी है। चंपावत जिले से भी बड़ी संख्या में वन पंचायत अध्यक्षों और सदस्यों के प्रदर्शन में शामिल होने की बात सामने आई है।
समिति का दावा है कि यदि वन पंचायतों को उनके अधिकार, वित्तीय संसाधन और मानदेय संबंधी मांगों का लाभ मिलता है तो इसका असर केवल वन संरक्षण तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, पलायन पर अंकुश लगेगा और महिलाओं के आर्थिक एवं सामाजिक सशक्तीकरण को भी बढ़ावा मिलेगा। समिति के अनुसार इन मांगों के पूरा होने से करीब एक लाख लोगों को रोजगार से जोड़ने की संभावनाएं बन सकती हैं।
जंगल बचाने वालों को अधिकार देने की उठी आवाज
वन पंचायत प्रतिनिधियों का कहना है कि उत्तराखंड की पहचान उसके जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों से है। ऐसे में जंगलों की जमीनी स्तर पर सुरक्षा करने वाली संस्थाओं को मजबूत किए बिना प्रभावी वन संरक्षण की कल्पना मुश्किल है। समिति का कहना है कि वन पंचायतों को केवल जिम्मेदारी देने के बजाय अधिकार, संसाधन और सम्मानजनक मानदेय भी दिया जाना चाहिए।
अब निगाहें 22 अगस्त के हल्द्वानी प्रदर्शन और उसके बाद शासन-प्रशासन की प्रतिक्रिया पर टिकी हैं। यदि बड़ी संख्या में वन पंचायत प्रतिनिधि प्रदर्शन में शामिल होते हैं तो यह आंदोलन प्रदेश में वन पंचायतों के अधिकारों और उनके भविष्य को लेकर एक व्यापक बहस का रूप ले सकता है।
मुख्य मांगें एक नजर में:
वन पंचायत सरपंचों को संवैधानिक दर्जा दिया जाए।
सरपंचों को ₹3,500 और पंचों को ₹500 मासिक मानदेय मिले।
वन पंचायतों को पूर्ण वित्तीय एवं प्रशासनिक अधिकार दिए जाएं।
कार्बन क्रेडिट की 30 प्रतिशत राशि वन पंचायतों को दी जाए।
एबीएस बेनिफिट/रॉयल्टी का लाभ सभी वन पंचायतों को मिले।
समानांतर ग्राम वन समितियों को समाप्त किया जाए।
वन पंचायत नियमावली-2012 के नियम 54 में संशोधन हो।
वन पंचायत समितियों में सरपंच को अध्यक्ष बनाया जाए।
सभी 11,217 वन पंचायतों को एबीएस का लाभ मिले।
सभी वन पंचायतों की डिजिटल सीमाएं निर्धारित की जाएं।
एक साथ चुनाव कराकर पांच वर्ष का निश्चित कार्यकाल तय किया जाए।
वन पंचायतों को रोजगार, पलायन रोकथाम और महिला सशक्तीकरण से जोड़ते हुए मजबूत किया जाए।
पूर्व रेंजर व प्रदेश संगठन संयोजक गणेश जोशी ने प्रदेश के सभी सरपंचों से आज हलद्वानी पहुचने की अपील की हैं।
