भारत मे बेकाबू मानसून
आखरीआंख
मानसून के तीखे तेवरों के चलते हिमाचल, पंजाब व उत्तराखंड में हुई तबाही ने भय और असुरक्षा का विस्तार किया है। भूस्खलन, बादल फटने व बाढ़ से हुई मौतों का आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है। बाढ़ के पानी से लबालब भरे हथनीकुंड से छोड़े गये लाखों क्यूसेक पानी के दिल्ली तक पहुंचने की आशंका जताई जा रही है। वहीं तीन दशक बाद सबसे
यादा पानी से भरे भाखड़ा बांध का पानी छोड़े जाने से पंजाब के सैकड़ों गांव बाढ़ की चपेट में हैं। सैकड़ों और गांवों को खाली कराया जा रहा है। कुदरत के रौद्र रूप के सामने इनसान बौना नजर आ रहा है। एक तो विकास के नाम पर पर्यावरण से मानवीय खिलवाड़ भारी पड़ रहा है, वहीं ग्लोबल वार्मिंग के प्रभावों के चलते बारिश के पैटर्न में अप्रत्याशित बदलाव आया है। पूरे मानसून सीजन में होने वाली बारिश कुछ ही घंटों में बरस कर समस्या को बेहद जटिल बना रही है। हिमाचल में दर्जनों मौतों के साथ करीब नौ सौ सड़कें बंद होने से आवागमन पूरी तरह बाधित है। शिमला-कालका के बीच सभी ट्रेनें रद्द कर दी गई हैं। घंटों लगने वाले जाम लोगों की दुश्वारियों को और बढ़ा रहे हैं। नि:संदेह बारिश के मिजाज में आये बदलाव के आगे हम बेबस हैं, मगर राहत व बचाव के लिये सुनियोजित रणनीति की उमीद तो सरकारों से ही की जाती है, जिसमें शासन-प्रशासन विफल ही नजर आता है। कहीं न कहीं बड़ी योजनाओं व सड़कों के विस्तार के लिए पहाड़ों का जो अंधाधुंध कटान हुआ है और बड़ी संया में पेड़ काटे गए, उससे अतिवृष्टि और मारक साबित होती है। जल निकासी के परंपरागत स्रोतों का बंद हो जाना भी जलभराव व भूस्खलन की वजह बनता है, जिसकी कीमत आम लोगों को जान-माल की हानि के रूप में चुकानी पड़ती है। शासन-प्रशासन लाचार नजर आता है।
आखिर जीवनदायिनी मानसून धीरे-धीरे मारक क्यों होता जा रहा है। आखिर बारिश?के पैटर्न में अप्रत्याशित बदलाव की वजह क्या है? क्या कहीं हम बंाधों के प्रबंधन में कहीं चूके हैं कि लबालब भरे बड़े बांधों का पानी अचानक छोडऩा पड़ता है, जो हर बार सैकड़ों गांवों को अपनी चपेट में ले लेता है। बांध प्रबंधन लाखों क्यूसेक पानी आननफानन में छोड़कर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेता है। इसी बीच भूस्खलन, सड़कें धंसने व मकान गिरने से लोगों के मरने की खबरें आती हैं, जो कहीं न कहीं भवन निर्माण की जगह के चयन में चूक और निर्माण की त्रुटि की ओर इशारा करता है। नि:संदेह मानसून के व्यवहार पर नियंत्रण सरकारों के बूते के बात नहीं है, मगर जान-माल की क्षति कम करने के प्रयासों में सजगता व सतर्कता की अपेक्षा तो शासन से की ही जा सकती है। राहत और बचाव में आधुनिक तकनीकों व सुनियोजित रणनीति का अभाव नजर आता है, जिसके चलते जानमाल की क्षति को कम नहीं किया जा सकता। दरअसल, पर्वतीय इलाकों में विकास व निर्माण के दौरान पहाड़ों के मिजाज व मानसून के दौरान उत्पन्न जटिलताओं का ध्यान रखा जाना जरूरी होता है। मगर, ऐसा होता नहीं है। हाल ही में केरल, महाराष्ट्र व कर्नाटक में आई बाढ़ की मूल वजह बांधों व नदियों के पानी के प्रबंधन में खामियां रही हैं। रायों में आपसी तालमेल का नितांत अभाव रहा है। वहीं केरल में भूस्खलन से होने वाली मौतों की मुय वजह ग्रेनाइट की खानों का खनन रहा है जहां जमीन धंसने से अधिकांश मौतें हुईं। जिन सात जगहों में जमीन धंसने से अधिक मौतें हुई हैं, उनमें से चार जगहों को गाडगिल और कस्तूरीरंगन पैनल ने पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील बताया था। यानी इन इलाकों में खनन की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए थी। अधिकांश मौतें इन्हीं जगहों पर हुई हैं।
