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October 12, 2026

सड़क सुरक्षा और फाइन

आखरीआंख
सड़क सुरक्षा में सुधार के मकसद से संशोधित मोटर वाहन कानून राष्ट्रीय स्तर पर अमल में आ चुका है, हालांकि जहां-तहां इसे लागू करने में कुछ अड़चनें बाकी हैं। इस कानून में ट्रैफिक से जुड़ी सभी गलतियों पर जुर्माने की राशि बहुत बढ़ा दी गई है, जिस पर बड़ी संया में लोगों ने आपत्ति जताई है। पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश सरकार ने इसी कारण इसको लागू करने से मना कर दिया है, जबकि राजस्थान ने कहा है कि जुर्माने की राशि की समीक्षा के बाद ही इस पर कोई निर्णय लिया जाएगा।
इस नियम के लागू होने के बाद जिस तरह से चालान काटे जा रहे हैं, उसे लेकर लोगों में भारी बेचैनी है। सीट बेल्ट न लगी होने पर 300 की बजाय एक हजार रुपये और प्रदूषण सर्टिफिकेट अपडेट न होने पर एक हजार के बजाय दस हजार रुपये फाइन किसी के गले नहीं उतर रहा। संशोधित मोटर वाहन कानून में दंड की राशि बढ़ाने का मकसद लोगों को सतर्क रहने के लिए बाध्य करना है। हमारे देश में ट्रैफिक नियमों को गंभीरता से न लेने के पीछे एक कारण जुर्माना कम होना भी रहा है।
कई बार लोग नियमों का उल्लंघन यह सोचकर करते हैं कि पकड़ भी लिए गए तो सस्ते में छूट जाएंगे। कुछ लोगों के लिए नियम तोडऩा शान की बात हो गई है। सड़कों पर अराजकता की यह एक बड़ी वजह है। तेज रतार से आए दिन लोगों की जान जाने, शराब पीकर कहीं भी गाड़ी ठोक देने और हेलमेट न पहनने के कारण मामूली एक्सिडेंट में भी हेड इंजरी से मौत की खबरें भी आती रहती हैं। रोड रेज हमारी सड़कों की स्थायी महामारी है।
यह वाकई शर्मनाक है कि दुनिया में सबसे यादा सड़क दुर्घटनाएं भारत में होती हैं और इनमें सबसे यादा लोग यहीं मरते हैं। ऐसे में एक रास्ता यह दिखता है कि जु्र्माने की राशि इतनी बढ़ा दी जाए कि जेब पर भारी दबाव लोगों को नियम मानने को मजबूर करे और धीरे-धीरे यह उनकी आदत का हिस्सा बन जाए। इसका असर भी हो रहा है क्योंकि नया कानून लागू होते ही लोगों ने हेलमेट खरीदने और प्रदूषण प्रमाणपत्र बनवाने के लिए भीड़ लगा दी है।
लेकिन जनता पर भारी जुर्माने के साथ ही सड़क सुरक्षा में कुछ जवाबदेही प्रशासन की भी बनती है। यह तभी संभव हो पाएगी जब सड़कों का हाल दुरुस्त हो। याद रहे, 2013-2017 के दौरान सिर्फ सड़क के गड्ढों के कारण हुई दुर्घटनाओं में 14,926 लोग मारे जा चुके हैं। ट्रैफिक सिग्नल अक्सर खराब रहते हैं। फुटपाथों पर अतिक्रमण हो चुका है। कई चौराहों पर ट्रैफिक पुलिस के दर्शन नहीं होते। सरकार सोचे कि चुस्त ट्रैफिक इंफ्रास्ट्रक्चर के बगैर सिर्फ भारी जुर्माना लगाकर सड़कों का हाल कितना सुधर पाएगा। यह भी कि कुछ गलतियों के लिए जु्र्माने की राशि कहीं इतनी तो नहीं बढ़ा दी गई है कि वह ट्रैफिक पुलिस का भ्रष्टाचार बढ़ाने में काम आने लगे।

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